आह वो दिन, वो रात वो सुबह, वोह शाम
Tuesday, May 19
आह वो दिन, वो रात वो सुबह, वोह शाम
Monday, May 18
अब तो हरा हरा दिख रहा है...
कांग्रेस के लोक सभा चुनाव में छाने के बाद अब शेयर मार्केट में हरियाली ही हरियाली दिख रही है। हमारा मन भी तो हरा हो गया।सारे चैनल का मन हरा हो गया।सारे रिपोर्टर और एंकर के चेहरा पर भी स्माईल आ गया।
ऐसे ही खुशी बरक़रार रखियेगा। मार्केट में यही मोमेंटम बनाये रखियेगा, यही गुजारिश है, आम लोगों की आपसे। जिस तरह से लोगों ने कांफिडेंस दिखाया कांग्रेस में, राहुल में सोनिया में और आप में उससे यही लग रहा है कि आप लोग ही सबसे बढ़िया काम कर सकते हैं।
हमें पूरी उम्मीद है कि मनमोहन सिंह के रहते कोई घुसखोर आदमी पास नही सट सकेगा। सटने के मतलब है फटक नही सकेगा।
अब क्या करें बहुते नेता लोंग आस लगाये थे कि केन्द्र में सरकार बने तो तनिक पैसा कमाया जाए। पर झटका तो पब्लिक ने दे दिया। जात-पात सब भुलाकर वोट दिए हैं इस दफा। जोहो वोट अडवाणी को मिले के था, वरुण गाँधी और नरेन्द्र मोदी ने ख़राब कर दिया। मैं तो इलेक्शन कवर करने में रह गया, वोटवा डाल ही नही सका। लेकिन जनता ने टिका कर वोट दिया। पब्लिक इस दफा, दारू और पैसा के पीछे नही भागे। अगर पैसा लिया, दारू पिया, फेर भी वोट अपने मन माफिक ही डाला। वाह रे चतुराई। पाँच साल का पासपोर्ट मिला है कांग्रेस को, इस दफा खूब काम करिए। अभरी तो कारत भी नही, लालू और मुलायम भी पस्त हो गए हैं।
दिखा दीजिये कि मनमोहन कमज़ोर नही है, सबसे बढ़िया प्रधानमंत्री है। तभी तो सबको बीट किए हैं। लेकिन एक गुजारिश है कि शिवराज पाटिल को गृह मंत्रालय नही दीजियेगा। बड़ा ही दिन कट्टु आदमी हैं।
Monday, April 27
लाज़िम है की हम भी देखेंगे...
वोह दिन की जिसका वादा था,
जो लोहे अज़ल में लिखा है,
जो जुल्मो सितम के कोहे गरां, रुई की तरह उड़ जायेंगे
हम मह्कुमो के पाँव तले, जब धरती धड धड धड्केगी
और अहले हिकम के सर ऊपर, जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
जब अर्जे खुदा के काबे से, सब बुत उठवाए जायेंगे
हम अहले सफ़ा मर्द्द-ऐ- हरम, मनसद से बिठाये जायेंगे,
सब ताजक उछाले जायेंगे सब तख्त गिराए जायेंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का जो गायब भी है हाजिर है
उट्ठेगा अनलहक का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो और राज करेगी खल्के खुदा
जो में भी हूँ और तुम भी हो...
इस गाने का लिंक:http://www.youtube.com/watch?v=y_EmyqTTHIY
Friday, April 10
जूते की मनोदशा.....
*जूता फेंकने के लिए जूते का मंहगा होना ज़रूरी नही......
*जूते के बदले चप्पल से भी काम चलेगा
*जूता लगे तो भी ठीक, न लगे तो भी ठीक....दोनों ही हालत में काम करता है.
*जूता फेंकने के लिए निशाना ज़रूरी नही..
*ज्यादातर निशाने से बाहर गया है जूता
*जूता देशी हो या विदेशी मैटर नही करता...
*जूता फेंकने वाला ज़रूरी नही की पत्रकार हो.
* जूता फेंकने वाला क्रन्तिकारी नही बन जाता.
*जूता फेंकने वाला अपराधी नही
*जूता फेंकने वाला पागल भी नही ..
*जूते की रफ्तार बताती है कि गुस्सा कितना है..
*जूता फेंकने से जूते की बिक्री नही बढ़ जायेगी...
*नेता अपने सामने अब राहुल द्रविड़ की सेवा लेंगे...
*जो काम कलम नही, अब जूता करेगा
*जूते को यकीन होने लगा है कि उसकी जगह अब पैरों में नही है ..
*जूता बनाने वाली कंपनी को अब देना होगा जूते की मजबूती का टेस्ट
क्या लगता है इतनी मिहनत से बनाया गया जूता नेताओं पर फेंकने के लिए ही बना है...??
जूते की शान में अपने अमूल्य विचार ज़रूर साझा करें...खुशी होगी...
Thursday, April 9
त्रस्त है लोकतंत्र
वोट मांगने के लिए निकल पड़ी है.....
नेताओं की जमात...
सफ़ेद कुरते-पायजामे में लम्बी कारों में
नतमस्तक
हर दरवाज़े पर रुकता है उनका कारवां
पूरब से पश्चिम से
उत्तर से दक्खिन से आकर
हर जगह धुल ही धुल नज़र आता है
और कलरव।
कोलाहल में मुद्दे खो जाते हैं
गरीब, मजलूम लोग
दो रोटी के लिए फाकाकशी करते लोग
दिहाडी करते लोग
कुदाल और फावडे चलाते हुए लोग देखते हैं,
आशा भरी नज़रों से
एकटक
लोग अनायास ही ऊपर उठा लेते हैं अपने-अपने हाथ
होने लगता है जयघोष
विजय मुद्रा में हाथ ताने नेता भी करने लगते हैं
लोकतंत्र का यशोगान
प्रजा भी मंत्रमुग्ध
हर पांच बरस बाद यह कारवां गुजरता रहता है
भारत की गलियों से, पगडंडियों से होकर
गरीबी दूर करने के वादे के साथ
सिर्फ प्रपंच सिर्फ़ प्रपंच
फिर इंडिया शाइन करने लगता है
टीवी के परदे पर, अख़बारों के पन्नो पर
जय हो-जय हो के नारे लगने लगते हैं
लोग भुला दिए जाते हैं
अगले पांच साल के लिए
जय हो लोकतंत्र-लोकतंत्र
Wednesday, April 8
सोचिये क्या होगा जब आपको कहा जाएगा कि आप कृपया जूता उतारकर प्रेस कांफ्रेंस में जायें। मैं तो धार्मिक बातों में टांग नही अडाता लेकिन मुझे दुःख है कि आने वाले दिनों में हम पत्रकार जूता पहनकर पत्रकार सभा में नही जा सकेंगे। भाई जरनैल सिंह ने तो यह शुरुआत कर दी लेकिन खामियाजा हम सबको भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।
आज सुबह गृह मंत्री पी चिदंबरम चंडीगढ़ आए लेकिन उन्होंने कोई कांफ्रेंस नही रखा। हमें मालूम है कि वैसे पत्रकारों के बारें में भी तलाश किया गया जिसका परिवार दिल्ली के सिख दंगों से किसी न किसी तरह से प्रभावित रहा हो।
चंडीगढ़ गेस्ट हाउस में चिदंबरम आए तो हम टीवी पत्रकारों को ५० मीटर दूर ही रखा गया।
हरियाणा निवास में घुसने नही दिया गया। वैसे चिदंबरम पहले जब भी चंडीगढ़ आए तो पत्रकारों को चाय पिलाकर ही जाते थे।
लोग उन्हें मधुरभाषी नेता तौर पर जानते हैं। कभी ऊँची आवाज़ में बात नही
करते। कल के वाकये में हमने देख लिए कि जूता फेंकने की घटना के बाद भी वो शांत भाव से बैठे मुस्कुराते रहे। ((साभार: कार्टून दैनिक भास्कर)एक पत्रकार होने के नाते जरनैल को जगह-जगह जाने और नेताओं से मिलने का स्वाभाविक अधिकार हासिल था। जिसे उन्होंने खो दिया है...एक पत्रकार के तौर पर उनका शायद ही अब कोई भविष्य है। भले ही बहुत सी राजनीतिक पार्टियां उन्हें टिकेट दे रही हो..एक पत्रकार के तौर पर उन्होंने इस पेशे को कलंकित किया है।
पत्रकारिता में हैं तो भावनाओं को काबू में रखें....
मेरा १२-१३ साल का पत्रकारिता का अनुभव है। कई राज्यों में काम किया मैंने। हर जगह आपको जरनैल सिंह जैसे पत्रकार मिल जायेंगे,जो एक पत्रकार कम एक्टिविस्ट ज़्यादा नज़र आते हैं। ऐसे लोगों के लिए किसी भी पार्टी का रास्ता खुला होता है।
(मुझे पता है कि जरनैल का परिवार भी उन हजारों सिख परिवारों में है जो सिख दंगे में प्रभावित रहे। इनको इन्साफ मिलना ही चाहिए) (जरनैल सिंह को ले जाते हुए पुलिसकर्मी)
यहाँ चंडीगढ़ में भी बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो कुछ पार्टियों की दलाली करते हैं। चाहे सरकार अकाली की हो या कांग्रेस कि वोह मुख्मंत्री के करीब नज़र आएंगे। हमें कई दफा कहना होता है कि मेहरबानी करके मुख्मंत्री कुर्सी की के पास से हट जाइये। हमें तस्वीर लेने में दिक्कत हो रही है। कई बार हमें शर्म आती है ऐसे पत्रकारों पर। जरनैल के कृत्य की सबने निंदा की है। उसके पास धारदार तो थी। मेरी जो बात हुयी है दिल्ली के पत्रकारों से सभी कह रहे हैं कि जरनैल बहुत अच्छा इंसान है।
नेता और पत्रकार के बीच एक विश्वास का नाता होता है..जिसे हम सबसे जानते हैं। तभी अपनी कुर्सी को खतरे में डालकर नेता बड़ी खबरें भी देते हैं। लेकिन जरनैल सिंह अपने पत्रकार होने की सीमा को तोड़ दिया। अब क्या ?
Saturday, April 4
पॉश इलाके में रहता हूँ..
मैं एक बड़े मकान में रहता हूँ
जहाँ बड़े-बड़े कमरे हैं
कमरे के साथ बाथ रूम भी है
बाथ रूम में झरने भी चलते हैं।
बड़ी बड़ी खिड़कियाँ है
हवा सांय सांय चलती है
सामने चमकती सड़क है,
जहाँ गाडियां सरपट दौड़ती है...
शहर का पॉश इलाका है
लोगों से मिलता हूँ
तो कहता हूँ कि फलां सेक्टर में रहता हूँ
पास-पड़ोस में ही मंत्री जी भी रहते हैं
जज साहिब की कोठी भी है
फर्लांग भर की दूरी पर
घर से निकलो तो सामने काफी कैफे है
बरिस्ता में भी भीड़ लगी रहती है
यहाँ बड़ी-बड़ी गाडियां का आना-जाना रहता है
शहर का पॉश इलाका है...
जहाँ मैं रहता हूँ
लोग कीमत नहीं पूछते यहाँ पर
सामान खरीद लेते हैं
पैसे बहुत हैं यहाँ
पर मैं खरीद नहीं करता यहाँ
सिर्फ देखता हूँ पैसे का मंज़र
जहाँ मैं रहता हूँ
वहां कोई-मोल भाव नहीं करता
मैं जहाँ रहता हूँ वोह शहर का सबसे पॉश इलाका है...
घर में पति-पत्नी और पांच नौकर रहते हैं...
कई कोठियों मैं तो सिर्फ नौकर ही राज करते हैं...
यह घर मेरा नहीं है...
हम तो भाड़े के घर में रहते हैं
कई सालों से
यह शहर मेरा नहीं है
मैं तो यहाँ किराए पर रहता हूँ...
मैं तो अब भी एक छोटे से गाँव में रहता हूँ
जहाँ मेरे बगीचे में ठंढी हवा चलती है..
जहाँ से बाज़ार अभी भी पांच मील दूर है
मैं तो यहाँ भाड़े पर रहता हूँ...
हर महीने पांच तारीख को रहने की कीमत अदा करता हूँ...
मैं तो सबसे पॉश इलाके में रहता हूँ।


