Wednesday, October 1

आतंक से लडने का तऱीका ग़लत

आतंक से लडने का तऱीका ग़लत
एक अखबार में खबर पढी कि नोएडा की एक मल्टीनेशनल कम्पनी ने अपने एक आई टी इंजीनियर को दरवाज़े से वापिस भेज दिया क्योंकि वो इस्लाम धर्म से ताल्लुक रखता था।
पंजाब के जालन्धर शहर में पिछले हफ्ते एक महिला शिक्षिका को उसके मुस्लिम होने कि वजह से नौकरी खोनी पडी। स्कूल मैनेजमेंट ने उसे स्कूल आने से मना कर दिया।
ये शायद इस तरह की पहली घटना नहीं रही होगी। इस तरह की जल्दबाज़ी से हम देश और समाज का फायदा नहीं नुकसान कर रहे हैं।सोचने का वक्त है। ग़ौर करने का वक्त है।
हर मुस्लिम आतंकवादी नहीं हो सकता। मालेगांव में विस्फोट से पहले एक मुस्लिम दुकानदार ने पुलिस को पहले ही बता दिया था कि थाने से कुछ ही दूरी पर एक लावारिस मोटर साइकल पडी है। पुलिस ने सुचना मिलने के बाद भी काम नहीं किया। नतीज़ा कई बेकसूर लोगों कि मौत। ये महज़ एक बानगी भर है। मान लेते हैं कि पूरी दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद का ज़ोर बढता जा रहा है। लेकिन उस हिसाब से हमारा खुफिया सूचना तंत्र काम नहीं करता। और न ही हमारा तरीक़ा सही है, आतंकवाद से निबटने का।हर मुस्लिम को आतंकवादी का मास्क पहना देना ग़लत है।
पंजाब ने भी १० साल से ज़्यादा आतंक का दंश झेला, लेकिन आतंकरूपी रावण को तभी मात दिया जा सका, जब यहाँ के लोगों ने दहशतगर्दों का फन कूचला।
आज संकट ज़्यादा बडा है। ये काम सिर्फ पुलिस का नहीं है, कुछ मुट्ठी भर अधिकारियों का नहीं है। समाज के सारे वर्गों को एकजुट करके आतंक को मात दिया जा सकता है। हाँ ये ज़रूर है कि हमारी ज़िम्मेदारियाँ बढी है। चाहे हम हिन्दु हों या मुसलमान।

1 comments:

रज़िया "राज़" said...

आपकी सोचको सलाम। सही है कि आतंकवाद का कोइ धर्म नहिं होता।किसी एक धर्म को आतंक के तराज़ु में न तोला जाये यही बहतर होगा। आज हमारे देश को "एकता" की बहोत जरूरत है।अगर अंदर ही अंदर धर्मो के नाम पर लडते रहे तो बाहरी शक्तियाँ हम पर हावी हो सकती हं।
भगवान/खुदा ने हमें नाम देकर पैदा नहिं किया था कि हम हिंदू हैं या मुसलमान?
तो फ़िर ये लडाइ क्यों?
मैं नवरात्रि के गरबा में बढचढ कर हिस्सा लेती हुं यहाँ तक कि मैं खुद गरबा भी लिखती हुं।
हमें तो किसी ने रोका या टोका नहिं! मेरे मन देशधर्म/इंसानियत ही सब से बडा धर्म है।
मेरे ब्लोग पर कमेन्ट ले लिये शुक्रिया।