Sunday, December 7

बोयें पेड़ बबूल के आम कहाँ से होए?

इन दिनों हिन्दी के ब्लॉग पर बहुत कुछ पढने को मिल रहा है। खासकर मुंबई में हुए आतंकी हमले की छाया कहीं गद्य और कहीं पद्य के तौर पर निखर कर आ रही है। बहुत ही उम्दा तरीके से आम लोगो के दर्द को बयां किया जा रहा है।
लेकिन मैं इस बात से इत्तफाक नही रख पाता हूँ कि अपने राजनितिक तंत्र को इस हद तक गरियाने से समाज बदल सकता है। रातों रात सब कुछ नही बदल जाता है। रातों रत कुछ नही बदल जाता है।
आपके पास जो राजनितिक नेतृत्व उपलब्ध है उसी के अन्दर से आपको विकल्प तलाशने होंगे। नेताओं का आप निर्यात नही कर सकते। हमारे जन तनतंत्र में यह बहुत ही सुलभ है कि आप जिसे चाहे गाली दे लें। जी भर कर दें लें लेकिन जहाँ पर बात लीड करने की आती है आप और हम पीछे हट जाते हैं बगलें झाँकने लगते हैं। कहने लगते हैं सियासत......न बाबा न. आज कैसे- कैसे लोग नेता बन रहे हैं?? आज कितने एम्.बी.ऐ और टेक्नोक्रेट सियासत में आने को तैयार है.
सर्वे करवा लीजिये किसी भी एजेन्सी से पता चल जाएगा...आम हिन्दुस्तानी की दोहरी सोच का। हमारे लोकतंत्र की यह बहुत बड़ी समस्या है। जिसे पढ़े लिखे लोग सिर्फ़ अध्ययन का विषय मानकर इस पर विचार नही करते. यह आपको और हम सबको पता है.शहाबुद्दीन, राजन तिवारी, आनंद मोहन सिंह, पप्पू यादव, डी पी यादव और दर्जनों ऐसे लोग, जिनकी औकात एक गुंडे से ज़्यादा नही है, हमारी राजनितिक व्यवस्था में अन्दर तक घुसे हुए हैं। संसद में जब मतदान होता हैं नुक्लेअर मुद्दे पर इनका वोट डालना अनिवार्य हो जाता है। क्या कह सकते हैं इसे सिवाय संस्थागत मजबूरी के अलावा।
"दरअसल राजनीति एक बेहद गंभीर पहलु है समाज का और इसे गंदे लोगो के भरोसे नही छोडा जा सकता है...और सुधार की उम्मीद की जा सकती है। " इसका मतलब यह नही है कि मैं भी राजनीति में कूद रहा हूँ...मैं भी वही सोचता हूँ जो करोडों हिन्दुस्तानी सोचते हैं।
मैं भी स्वार्थी हूँ। मैं भी कायर हूँ.मैं भी भीरु हूँ...मै भी बकवास करता हूँ। नेताओं को गाली देता हूँ। जब मौका आता है चुप बैठ जाता हूँ। राजनीति को गंदे लोगों का गन्दा खेल मानता हूँ।
हम हिन्दुस्तानी शोर्ट कट रास्ता इजाद करने में माहिर हैं। मान लेते हैं मुंबई ब्लास्ट के बाद मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के बदलने से जनता का आक्रोश कम होगा लेकिन पुलिस फोर्स को बेहतर हथियार दिलाने के लिए क्या कागज़ दो साल तक नही अटकी रहेगी सचिवालय के गलियारों में...?
मुझे पंजाब के कुछ सेवा निवृत अधिकारी बता रहे थे किस तरह यहाँ अच्छे हथियार लाये गए थे आतंकवाद से निबटने के लिए...पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह होते थे और पुलिस प्रमुख थे के पी एस गिल। घंटे भर में आधुनिक हथियारें मुहैया करा दी गयी। मुख्यमंत्री के लिए जो चोप्पर था उसे पुलिस प्रमुख को दे दिया ताकि पुलिस बेहतर तरीके से लड़ाई लड़ सके। यह उद्धरण मैं इसलिए दे रहा हूँ की हमारे राजनेता समझ सकें की लड़ाई लड़ना कितना आसान हो जाता है अगर पर्याप्त राजनितिक इच्छा शक्ति हो। आज के वक्त में क्या हमारा नेता अपनी सुरक्षा का त्याग कर सकते हैं???ताकि जनता महफूज़ रहे?कतई नही!!कुछ दिनों पहले शरद यादव से यह सवाल पुछा गया की क्या वोह अपनी सुरक्षा कम करेंगे...उन्होंने कहा नही...वोह ऐसा नही कर सकते। ज्यादातर नेता ऐसा ही करेंगे.हमें पता चलता रहता है कि नेता अपनी सुरक्षा बढ़वाने/अपग्रेड करने के लिए क्या-क्या तमाम बहाने करते हैं।लब्बोलुआब यही है कि हमने जैसा बोया है वैसा काट रहे हैं। राजनीति के इस बियावान में अगर बहार लानी है तो अच्छे बीज लगाने कि ज़रूरत है.फ़िर अच्छी फसल तैयार होगी. नही तो झूठे और मक्कार नेता ही पैदा होंगे.जो कहेंगे कुछ औ करेंगे कुछ. नेताओं की अच्छी फसल कैसे तैयार हो...जब बोयें पेड़ बबूल के आम कहाँ से होए?

6 comments:

विष्णु बैरागी said...

आपने बिलकुल ठीक कहा । हम अपनी ही करनी के फल भुगत रहे हैं ।
नेता हमारे लिए होता है लेकिन हम अपने आप को उसके लिए बना लेते हैं । उसकी हर मनमानी को आंखें मूंदकर, चुपचाप सहन करते रहते हैं, यह सोचकर कि क्‍या पता कब उससे काम पड जाए । जब तक हम इस स्‍वार्थ भावना से मुक्ति नहीं पाते, नेताओं को गालियां देकर, शुतुरमुर्ग की तरह अपने आप से बचने की बेशर्मी करते रहेंगे ।

सुशील कुमार छौक्कर said...

बात तो सोलह आनी सच्ची कह रहे हो दोस्त।

आओ अपने अदंर भी झाँक लें
अपने अपने कर्तव्यों को पहचान लें।

Ratan Singh said...

बिल्कुल ठीक लिखा है मै आपसे पूर्णतया सहमत हूँ |

mala said...

सच कहा आपने , हम अपनी ही करनी के फल भुगत रहे हैं ।
सार्थक आलेख , बधाईयाँ !

एस. बी. सिंह said...

राजनीति को सब ने चौराहे की कुतिया मान लिया है, जो भी आता है लतिया कर चला जाता है। ख़ुद राजनीति करेंगे नहीं बस दूसरों को गरियायेंगे। भाई जब हम सब ने राजनीति आनंद मोहन , शहाबुद्दीन, पप्पू यादव और डी.पी यादव जैसों के भरोसे ही छोड़ रखी है तो उसका हश्र यही होना है। वैसे इतनी शिद्दत से गरियाते वही है जो वोट देने तक को झंझट समझते है।

अच्छी पोस्ट के लिए शुक्रिया।

sandhyagupta said...

Achcha sawal uthaya hai aapne.