Saturday, December 13

निम्बू की चाय और वर्ग-भेद
दशरथ साहू की उमर ४० साल से ज़्यादा नही लगती है लेकिन ये अपनी उमर ५० से पार बताते हैं. रांची में रातू रोड पर गुरूद्वारे के साथ में इनकी चाय की दुकान होती थी. लेकिन दुकान अब वहां से थोडी सी हट गयी है १०० मीटर के करीब. दशरथ आदिवासी हैं. जब १० साल की उमर थी तभी से चाय की दुकान चला रहे हैं. पहले दूध की चाय बनाते थे अब लेमन चाय बनाते हैं. दशरथ कहते हैं की निम्बू की चाय यहाँ लोग ज़्यादा पसंद करते हैं. दो रूपये में चाय मिलती है..ऊपर से निम्बू के साथ काली मरीच का तड़का लगाते हैं. जिससे इसका स्वाद मुझे किसी भी फाइव स्टार होटल और बरिस्ता से भी अच्छा लगता है. पिछले दिनों जब में अपने परिवार के एक सदस्य की शादी में रांची गया तो कोलकाता से छपने वाले टेलेग्राफ अख़बार की खोज में रांची की सड़क का सुबह सुबह चक्कर लगा रहा था. वहीँ दशरथ पर मेरी नज़र पड़ी.
मैं लेमन टी का बहुत बड़ा फैन रहा हूँ और यहाँ देखकर मुझे ताज्जुब लगा की बहुत से गरीब तबके के लोग, सडकों पर दिहाडी करने वाले लोग, निम्बू की चाय चुस्की लेकर पी रहे थे. मुझे बहुत बड़ा सुकून मिला की निम्बू की इस चाय ने कितने बड़े वर्ग भेद को ख़तम कर दिया है.
मैंने भी एक चाय आर्डर की. फ़िर एक नही तीन ग्लास चाय पी. उसकी चाय ने मुझे कायल कर दिया. मैंने सोचा कि दशरथ के साथ अपनी एक फोटो खींचकर रख लूँ. उसे अच्छा लगेगा. नतीजा मुझे एक और चाय पीनी पड़ी.
सतही तौर पर तो मुझे ऐसा लगा कि उसकी अच्छी कमाई होती होगी, लेकिन जब पुछा तो उसने बताया कि उसके चार बच्चे हैं और कोई भी मिडल स्कूल से ज़्यादा नही पढ़ सका. दो बेटियों की शादी कर दी है, वोह नाना बन गया है. रातू रोड के साथ उसने ४०००० रूपये में ज़मीन लेकर दो कमरे का एक घर बना लिया है. पिछले ४० साल में उसकी कुल जमा कमाई यही रही है. दशरथ ने ४० साल में भले ही महज़ १०० मीटर का फासला तय किया हो. उसके बच्चे नही पढ़ सके, ये उसे गम है लेकिन वो बेहद खुश है की उसने अपनी मिटटी नही छोडी. उसको यहाँ की गलियां खुबसूरत लगती है.
४ रूपये में लिट्टी और चोखा खाकर वो आराम की नींद सो सकता है. हिंदुस्तान के किस हिस्से में ये सम्भव है? ५-१० रूपये में ४ रोटी और सब्जी उससे कहाँ मिलेगी ? यहाँ उसे नौकरी खोने का डर नही सताएगा. यहाँ उसे मंदी का डर भी नही सताएगा. दशरथ मेरी तरह मुंबई, दिल्ली और पंजाब नही जाएगा. वो अपनी चाय की दुकान से होने वाली कमाई से बहुत खुश है.
आज उसकी चाय की नक़ल बरिस्ता और काफ़ी कैफे वाले करते हैं. आदिवासी महिलाओं का रोज़गार छीनने के लिए बड़ी-बड़ी सब्जियां बेचने वाले रिलायंस फ्रेश और न जाने कितनी चैन खड़ी हो गयी है लेकिन मैं यह बता दूँ कि मुझे सड़क के किनारे खेत से लाई गयी सब्जियां ज़्यादा अच्छी लगती हैं ... मुझे बड़े बड़े स्टाल में जाने से अच्छा लगता है की मैं सड़क के किनारे बैठी महिला से मछलियाँ खरीद कर लूँ. जिसे २० और २० कितना होता है यह पता नही होता है. मैं एक ऐसे अर्थशाश्त्र का हामी हूँ जिसमें गरीब के पास भी ५ रुपया जाए. इसलिए जब मौका लगे दशरथ की चाय ज़रूर पीयें. हो सकता है उसके जैसे हजारों लोगों के बच्चे कम से कम १० वीं क्लास ज़रूर पास कर जायें.

5 comments:

Mired Mirage said...

नींबू की चाय तो मुझे भी बहुत पसन्द है । दशरथ साहू की उन्नति हो ।
घुघूती बासूती

अजित वडनेरकर said...

बहुत अच्छा लगा ब्रजभाई....
दशरथ भाई के लिए दुआए हैं...
आपके लिए शुभकामनाएं...

BHARTIYA said...

good

सतीश पंचम said...

रोचक विवरण दिया है। अच्छी पोस्ट।


वैसे एक बार मुझे भी ऐसा ही अनुभव हुआ था। नींबू की चाय तो नहीं पर गरमा-गरम पकौडों का स्वाद ऐसे ही एक बेहद छोटे से सौदागर के द्वारा मिला था।

हुआ यूँ कि दो तीन साल पहले दिसंबर-जनवरी के बेहद ठंडे महीने में जौनपुर शहर से देहात एक मोटरसाईकिल द्वारा अपने मित्र के साथ जा रहा था, शहर छोड कर जैसे ही देहात का खुला क्षेत्र आया, मारे सर्दी के जान निकलने लगी, भूख अलग से लगी थी। थोडी दूर जाते-जाते हालत खराब हो गई। सोचा वापस लौटते हैं शहर की तरफ कुछ खा कर जाते हैं लेकिन जाने क्या सोच कर आगे ही आगे बढे जा रहे थे। तभी एक घर से सटी छोटी सी गुमटी दिखाई पडी और हम बिना कुछ देखे कि क्या है, क्या नहीं गुमटी में जा बैठे। देखा तो एक ठंडी चाय की पतीली और ठंडा होता कोयला, चाय वाला हमारी निराशा को भांप गया। बोला - इतने अंधेरे अब कोई क्या आयेगा सोचकर आग ठंडी कर दी है, कहो तो कुछ बना दूँ। हमें लगा कि ये इतनी जल्दी क्या बनायेगा, चलो चलते हैं। तब तक उस चाय वाले की बहू ने भीतर से कहा - रूकिये, अभी बन जाता है। और हमारे देखते न देखते पंद्रह-बीस मिनट में धनिये की चटनी पकौडे सहित हाजिर। खुब छक कर खाया और फिर से बनी चाय का स्वाद लिया। उस समय हमारे मन में भी वही भाव आये थे कि आखिर ये कितना कमा पाता होगा....लेकिन जो आत्मिक संतोष उस शख्स ने कमाया वह हम और आप क्या कमा पायेंगे।



आज भी जब साल-दो साल में उस रास्ते गुजरता हूँ तो गुमटी को देख वह ठंडी शाम याद आती है जिसने हमें गर्म पकौडों की खुराक परोसी थी।

एस. बी. सिंह said...

भाई हम सब के कोई न कोई दशरथ साहू हैं पर बाजारवाद और वैश्वीकरण की अंधी दौड़ में ऐ कब तक बच पायेंगे।