Saturday, December 20

राधा की मोहन

प्यार हिम्मत देता है। प्यार डर भी देता है।प्यार दर-दर भटकने को मज़बूर करता है। प्यार करने वाला कुछ समझता नहीं है। प्यार करने वाला सब कुछ समझता है। प्यार सब कुछ लूट लेता है। प्यार करने वाला सब कुछ लूटा देता है। प्यार करने वाला पागल होता है। प्यार बेहया बना देता है।प्यार बगावत करने को मजबूर कर देता है।
हरियाणा के उपमुख्यमंत्री रहे चंद्रमोहन ने अपने मन के मीत अनूराधा बाली से निकाह करके ये बता दिया कि प्यार करने की कोई ऊमर नहीं होती है।
प्यार के लिये चंद्रमोहन चांद बन गया और अनुराधा फिज़ा। चांद ने सब कुछ निछावर कर दिया। सब कूछ लूटा दिया।
अपनी सियासत, अपनी हैसियत, अपना रुतबा और अपनी कुर्सी। प्यार किया तो डरना क्या?
पहले जो वह मरसिडीज़ कार में अपने कमांडो के साथ घूमता था। अब वो फिज़ा को सेन्ट्रो कार में बिठाकर खुद गाडी चलाता है।
वक्त बदलता रहेगा। लेकिन प्यार की लौ जलती रहेगी। प्यार करने वाले किरदार ज़रूर बदल जायेंगे।
गालिब ने भी खूब लिखा कि किस तरह प्यार करने वाला बहार में हंसा। ख़िज़ा में रोया, मारा-मारा फिरा। इश्क की ये आग ऐसी है जो ना आसानी से लगाये लगती है, न बूझाये बनती है।
"इश्क पर ज़ोर नही है वह आतिश ग‌़ालिब,
जो लगाये ना लगे और बुझाये ना बने।"
लैला, मज़नूं, सिरी और फरहाद ने दुनिया की ऐसी की तैसी की। खुद की भी ऐसी की तैसी कर ली। मीरा ने अपने मोहन के लिये हलाहल पिया। बेचारी राधा वन-वन भटकती रही। बाबली बनकर। लोग राधा को देवी मानते हैं।राधा का नाम लोग कृष्ण से पहले लेते हैं।
पंजाब के मशहूर कवि धनीराम चात्रिक ने लिखा है,
"इस इश्क दी चल्लेगी बात उत्थे।
जित्थे चार बंदे मिल बहण्गे नी।
कडे कुबजां नूं किसे ने पुछणा नहीं,
राधा आख फिर कृष्ण कहणगे नी।
जब भी मोहन की बांसुरी बजी। सभी गोपियाँ दौडी चली आईं। कौन रोक पाया गोपियों को जब मोहन की बांसुरी बजी।
पारो के प्यार में देवदास ने अपनी दुनिया में ही आग लगा ली। सब कुछ राख हो गया। खूद देवदास भी।
वक्त गवाह है। चन्द्रमोहन ने अपनी पहली पत्नी और बच्चौं को त्याग दिया। उसे पूरी तरह से पता था कि बगावत का अंजाम क्या होगा। भजनलाल संपत्ति से बेदखल कर देंगे। घर परिवार वाले उस पांच सितारेनुमा घर में उसे नहीं घुसने देंगे।
अब चाँद के सामने बहुत बडी मुसीबत है कि वो ४३ साल की उम्र में नई ज़िंदगी की शुरुआत करेंगे।नई राजनीति की शुरुआत करेंगे।क्या उनकी विधानसभा के लोग इस बातको मान लेंगे कि उन्होंने निज़ी ज़िन्दगी में जो कुछ भी किया वो ठीक किया।
शायद पहले ऐसे नेता नहीं हैं जिन्होंने दूसरी महिला से शादी करने के लिये अपना धर्म बदल कर इस्लाम कबूल कर लिया। सबसे पहले हमारे ज़ेहन में अभिनेता धर्मेन्द्र देओल का चेहरा आता है, जिन्होंने १९७९ में ड्रीमगर्ल हेमामलिनी से शादी करने के लिये इस्लाम कबूल कर लिया। उनकी पहली शादी प्रकाश कौर से हुई थी। जिससे सन्नी देओल और बाबी देओल पैदा हुए। धर्मेन्द्र बाद में दिलावर खान और हेमा आयशा बी बन गये। शादी से पहले धर्मेन्द्र जाट थे और इनका पूरा परिवार आर्यसमाजी था। २००४ में बीकानेर की जनता ने धर्मेन्द्र को संसद पहुँचा दिया। यहाँ उनका जाट कार्ड खुब चला। ये दीगर बात है कि उनके हल्के के लोग आजकल उनसे इसलिये खफा हैं कि वो बीकानेर जाते ही नहीं हैं।
शर्मीला टैगोर टाइगर मंसूर अलि खान पटौदी से शादी करने के लिये आयेशा सुल्ताना बन गयी। सदाबहार गायक किशोर कुमार मधुबाला (वो मुस्लिम थी) से शादी करने के लिये करीम अब्दुल बन गये। कितने लोगों को याद है कि किशोरदाका नाम करीम अब्दुल भी है।
हिन्दी की बहुत सी फ़िल्मों में औरत और पर-पुरुष के रिश्तों को बखूबी दिखलाया गया है। महेश भट्ट की "अर्थ" का कथानक यही है। एक और फ़िल्म इजाज़त का खास तौर पर ज़िक्र यहाँ करना लाज़मी है, जिसमें गुलज़ार ने अपने गीतों के ज़रिये बहुत ही खु़बसूरती से स्त्री और पर-पुरुष की कहानी को दिखाया है।
भारतीय राजनीति में ऐसे किरदारों की कोई कमी नहीं है जो दोहरी ज़िन्दगी जीते रहे हैं। अटल बिहारी बाजपेयी कहते रहे कि वो शादी-शुदा नहीं हैं लेकिन कुंवारे भी नहीं हैं। जार्ज फर्नानडिज़ भी जया जेटली के साथ सालों से लिव-इन- रिलेशनशिप में रह रहे है। पंजाब के पुर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरींदर सिंह तो लाजवाब हैं।उनके पाकिस्तान की पत्रकार अरूसा आलम के साथ रिश्तों की बात खुलकर सामने आयी। अरूसा तो अमरींदर के पाटीयाला के मोतीबाग पैलेस में भी हफ्ते भर से ज़्यादा रही। लेकिन कैप्टन की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। उनकी पत्नी और पाटियाला से सांसद रही परणीत कौर भी पूरे मामले पर चुपचाप ही रहीं।
चन्द्रमोहन ने ऐसा कुछ नहीं किया। वो नैतिकता का लबादा नहीं ओढे रहे। प्यार किया तो खुलकर किया। दुनिया जाये भाड में।
शादी की खबर मिलते ही हरियाणा के मुख्यमंत्री ने अपने केबिनेट साथी को बाहर का रास्ता दिखा दिया। शायद वो एक बडे विरोध की कल्पना कर रहे थे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
अभी जब मैं ये सब कुछ लिख रहा हूँ तो मुझे फतेहाबाद से एक रोचक खबर मिली कि वहाँ एक मुस्लिम लडके ने एक हिन्दु लडकी से भागकर शादी कर ली।अलि हसन अजय बन गया। वो पहले से शादी शुदा है, दो बच्चे भी हैं। लकिन प्यार की कोई दवा नहीं है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुये उसे सुरक्षा दे दी है। वो वापस गांव लौट गया है।
अदालत को देखना चाहिये कि अगर चन्द्रमोहन को सुरक्षा की ज़रूरत हो तो ज़रूर मुहैया करायी जाए।ये शादी करने वालों के विवेक पर छोड देना चाहिये कि वो इस्लाम या हिंदू धर्म क्यों स्वीकार कर रहे हैं?
ज़ाहिर है प्यार करने वाले किसी की नहीं सुनेंगे। प्यार करने अपने दिल की ही करेंगे।प्यार करने वाले झुठ बोलते रहेंगे। इसमें कोई शक नहीं कि शादी करने की ख़ातिर इतने सारे लोग मुसलमां बने। इसमें क्या गलत है, और क्या सही है इसपर बहस भी चलती रहेगी।

2 comments:

सुप्रतिम बनर्जी said...

भाई,
बहुत ही उम्दा लिखा है। इतना डूब कर वही लिख सकता है, जिसने ख़ुद कभी प्यार किया हो। (मेरा मतलब शादी के बाद बीवी से हो जानेवाले प्यार से नहीं है।) इस पोस्ट में प्रेम-रस तो है ही, तथ्यपरक जानकारियां भी बहुत हैं। बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

सबकी कहानी said...

जवाब देना ज़रूरी है...
राजेश जोशी की एक कविता पढ़ी आज, "राजपाट का राज ". इसका एक छोटा सा हिस्सा आपकी नज़र है...
" प्रेयसी, कौन है प्रेयसी?
पत्नी, पत्नी ही है प्रियतमा
पीछे की बातें छोड़ दें.