आज मन बहुत अशांत है। ख़ुद से कोफ्त हो रही है। एक नागरिक के तौर पर ख़ुद को असहाय महसूस कर रहा हूँ। मैं सोच चुका था की अंतुले पर लिख कर अपने ब्लॉग को गन्दा नही करूंगा। लेकिन क्या करुँ? चुप कैसे रहूँ ?
ऊपर से लग रहा है कि देश हित के मुद्दे पर हम एकजुट हैं लेकिन नीचे का आधार दरक रहा है। आज सुबह सुबह अख़बारों पर नज़र गयी तो एक बात मेरे दिमाग में कौंध रही थी कि आखिर क्या हम झंझावातों के खिलाफ चट्टान की तरह खड़े होने की हिम्मत रखते हैं। यह सवाल मैं ख़ुद से पूछ रहा हूँ। पूरे देशवासियों से पूछ रहा हूँ।
कल मैं संसद में हो रहे बहस को देख रहा था। कांग्रेस यह तय नही कर पा रही थी कि अंतुले के बयां पर क्या रुख अपनाया जाए। अंतुले जितना नुकसान कर सकते थे, कर चुके हैं। देश का तो अंतुले ने तो अहित किया ही, कांग्रेस को भी न घर का छोड़ा न घाट का। अंतुले का पाप न छिपाते बन रहा है और न ही ज़ाहिर करते।
अंतुले आज पाकिस्तान में जिहादियों के हीरो बन चुके हैं। पाकिस्तान उसे मुस्लिमो का सच्चा हीरो कह रहा है..हिंदुस्तान की मिटटी में पैदा होकर उन्होंने वोह सब कुछ किया है जिसपर देशभक्त मुसलमानों को फख्र नही हो सकेगा। कांग्रेस को हिम्मत नही है कि वोह अंतुले जैसे घिनौने लोगों को पार्टी से निकाल दें।
कई लोग कह रहे हैं कि अंतुले के खिलाफ देशद्रोह का मामला चलना चाहिए...मैं भी इस राय से इतेफाक रखता हूँ। आखिरकार जब जांच चल रही हो तो उसके बीच मैं "अनुमान" के आधार पर बकवास करने का क्या औचित्य है। १८८५ में बनी कांग्रेस की सियासत वोट को लेकर चलती रही है। तभी अंतुले जैसे दो पैसे के लोग १०० साल से पुरानी पार्टी को धता बताकर अभी भी कैमरा के सामने खड़ा होने की जुर्रत करते हैं।
सोनिया अंतुले की गीदड़ भभकी में फंस चुकी है।अंतुले हिंदुस्तान में वोट की राजनीति का प्रतीक है। उस जैसे लोग ही अतीत में पाकिस्तान बनने के लिए जिम्मेदार रहे हैं। और अगर पाकिस्तान जैसा मुल्क जिंदा है तो उसमें अंतुले का बहुत बड़ा हाथ है। मुझे लगता है की अंतुले जैसे लोगों अगर कांग्रेस में बने हुए हैं तो हमें लड़ाई करने की बात नही करनी चाहिए. क्योंकि दुश्मन जब घर में ही है, लड़ाई की बात करनी भी बेमानी है.
Tuesday, December 23
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3 comments:
अंतुले एक बेवकूफ राजनेता से ज़्यादा कुछ नहीं है. उसे ये भी मालूम नहीं की उसने ग़लत समय पर अपनी बेलगाम जुबां खोलकर आम भारतवासियों के लिए कितनी बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है. कमाल तो ये है की अपनी बेवकूफी पर परदा डालने के लिए लगातार ये भी कह रहा है की मैं करकरे की शहादत पर ऊँगली नहीं उठा रहा, वो तो बहुत बहादुर अफसर थे. बल्कि मैं तो ये मांग कर रहा हूँ की उनको कामा हॉस्पिटल की तरफ़ किसने भेजा. अब कोई अंतुले को कैसे समझाए की आखिर आतंकवादियों ने तो उनको फ़ोन नहीं ही किया होगा और लगता है की आतंकवादियों को भी उन्हें मारते समय ये अहसास नहीं होगा की उनके हाथ एस टी ऍफ़ के चीफ लग गया है. बहरहाल जो भी हुआ दुर्भाग्यपूर्ण है!
मुंबई में हुए आतंकी हमलों ने हमारे खद्दरधारी नेताओं की बुद्धीमत्ता की पोल खोल दी है। अंतुले साहब ने सबसे ज्यादा हद पार की है लेकिन देखा जाए तो शुरू से ही चाहे वह हमरे गृहमंत्री साहब हों - जो कमाड़ों की संख्या जाहिर कर रहे हों, नकवी साहब - महिलाओं को लिपस्टिक-पॉवडर लगाने वाली कहकर व्यंग कस रहे हों या फिर अपने अभिनेता पुत्र के मोह में फँसे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हो....ये सभी एक-एक कर जता रहे हैं कि किसी अप्रिय स्थिति में गंभीर होकर व्यवस्था संभालने की जगह यह राजनैतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश करेंगे...और जब कोशिश गलत होगी तो मुँह भी साथ छोड़ेगा ही और जनता वाकिफ होगी अपने राजनेताओँ की असलियत से।
KJS Vohra & party are totally unqualified & inexperienced in the profession of fitment of artificial limbs and are not authorized to deal with disabled patients as per Rehabilitation Council of India Act. Dr. V.J.S. Vohra, the eldest son of late Col. D.S. Vohra, along with his father established in 1973 Nevedac Prosthetic Centre, Zirakpur, Chandigarh. Dr. V.J.S. Vohra is now being victimised and threatened by KJS Vohra & party, who are unnecessarily interfereing in the patient's work at NPC and not allowing the patients to avail the professional care of Dr. Vohra who has vast experience & expertise in this profession. Dr. Vohra is registered with Rehabilitation Council of India and is also Hony. Prosthetic Adviser to Governments of Punjab, Haryana, Chandigarh & Himachal.
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