अपने कंधे पर
सतरंगे ख्वाबो को झोले में भर
हम निकल पड़ते हैं
अपने गांव को छोड़
शहर में, फ़िर महानगर में
पहाडों पर, बियाबान में
तलाशते, टटोलते, भटकते
मारे-मारे फिरते, बिना थके, बिना रुके
अनंत और, और कितनी दूर
फ़िर हमारे अन्दर गांव जिंदा होने लगता है।
देह कहता है, थक गया हूँ,
मन कहता है, लौट भी आओ
आत्मा कहती है, बस भी करो
लौट आओ
अपने बगीचे के लिए,
सुबह की धूप के लिए।
अपने तालाब के लिए, झरबेरी के पेढ़ के लिए
चोटी सी गोरैया के लिए,
लौट आओ, लौट भी आओ।
कितने साल हो गए हैं,
घर के चूल्हे पर सिंकी गरम-गरम रोटी खाए
कहाँ भाग रहे हों फाइव स्टार होटलों, बार और पबों में
अपने खेत में पैदा हुयी धनिया की चटनी
और भतुआ साग खाने में जो मज़ा है
वोह कहाँ है दुनिया भर के खाने-खजाने और जायके में
कहाँ जा रहे हो लौट भी आओ।
मैं भी न कब से भाग रहा हूँ ?
उफ़ ये कितनी बड़ी धरती है।
Monday, December 29
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1 comments:
अपने कंधे पर
सतरंगे ख्वाबो को झोले में भर
हम निकल पड़ते हैं
अपने गांव को छोड़
शहर में, फ़िर महानगर में
पहाडों पर, बियाबान में
तलाशते, टटोलते, भटकते
मारे-मारे फिरते, बिना थके, बिना रुके
are वाह ....क्या बात है ....खूबसूरत
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