Thursday, October 23

ये भारत है किसका??
तस्वीरों में भारत: यहाँ मैं हिंदुस्तान की अलग-अलग तसवीरें आपको दिखा रहा हूँ। पहली तस्वीर वो है जिसको देखकर आपको फख्र होगा। दूसरी तस्वीर वो है जो भारत की आत्मा पर लगातार चोट कर रहा है।
बल्कि यहाँ आपको यह बता रहा चंद्रयान ने चाँद की तरफ़ अपने कदम बढ़ा दिए हैं। कुछ हफ्ते के अन्दर हमारा चंद्रयान चाँद की सतह पर होगा। हमारे लिए ये गौरव की बात है कि भारत ने विकसित देशों के बीच अपनी धाक कायम कर ली है।
बावजूद इसके कि हिंदुस्तान एक विकासशील देश है। अभी भी हमारी इतनी बड़ी आबादी को भरपेट खाना नसीब नही होता है। लाखों बच्चे स्कूल नही जा पातेहैं। कुपोषण की वजह से हिंदुस्तान में लाखों बच्चे असमय ही मर जाते हैं। लेकिन हमें फ़िर भी फख्र है कि हमारे वैज्ञानिक इतना कुछ कर रहे हैं।
चंद्रयान जब चाँद पर पहुंचेगा तो वहां से धरती बहुत छोटी नज़र आयेगी। हिन्दुस्तान एक बिन्दु मात्र जगह होगा। बड़े से अन्तरिक्ष में कुछ भी नही। चाँद पर हम हिंदुस्तान नही पूरी मानवता का संदेश लेकर जायेंगे। वहां न आग लगाने वाला राज ठाकरे होगा लालू होगा न अमर सिंह होगा.मराठी होगा न पंजाबी होगा न गुजराती। हम माँ धरती के बेटे होंगे। चंद्रयान जो संदेश चाँद से प्रसारित करेगा उससे पूरी मानवता का फायदा होगा। हिंदुस्तान का।
अगला चरण है जिसमें चंद्रयान के साथ कुछ वैज्ञानिक भी जायेंगे। लेकिन ये भारत है किसका? क्या राज ठाकरे का, लालू का, मायावती का, अमर सिंह का। किसका? इनकी ओछी सोच देश को किस दिशा में धकेल रही है। भारत के अन्दर कितने भारत बना रहे हैं ऐसे लोग। जब हम अन्तरिक्ष से नीचे देखें तो हमें एक भारत नज़र आये। आज जब पूरी दुनिया छोटी हो रही है, लोग आपस में एक हो रहे हैं। ये नेता लोग क्या कर रहे हैं। हम तय करें कि ये वाकई हमारे देश को आगे ले जायेंगे या हमें ये हज़ारों साल पीछे धकेल रहे है। जो हिन्दुस्तान की भलाई चाहते हैं वो ज़रूर इस बात पर बहस करे।

Wednesday, October 22

गुजरात में काकटेल की जगह मॊकटेल

मिल्ट्री वालों की प्रेस कान्फेंस का अपना ही आकर्षण है। मुफ्त में दारु। गुजरात जैसे राज्य में तो यह विशेष आकर्षण है। दारुबंदी जो है यहां। आप फौजियों की प्रेस कांफ्रेंस में बेफिक्री से मदहोश हो सकते हैं।
पर पिछले कुछ समय से फ़ौजियों की प्रेस कांफ़्रेंस सूखी ही रहती है। दारू तो छोडो बीयर भी नही मिलती है। काकटेल की जगह मॊकटेल परोस देते है, अपने फ़ौजी भाई। बोलो कोई चीयर्स कैसे करे। साफ़ है कई लोग तो आते ही नही हैं । कुछ आते हैं तो फ़ौजियो की शुष्कता को कोसते रहते हैं।
अपने मित्रो के हित में हमने अपनी खोजी पत्रकारिता की सारी तरकीबे लगा दी। हमारे पास फौज में पत्रकारों की दारुबंदी का विश्‍वसनिय जवाब है। आप इसे हमारा 'स्कूप' कहें तो हमें काफी आनन्द होगा!हुआ यूं कि २००४ में वायुसेना के तत्कालिन एयर मार्शल पी. के. मेहरा, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने गये। इस औपचारिक मुलाकात में बातों बातों में मेहरा ने वेट के कारण महंगी हुई शराब की तर्ज पर फौजी की समस्या बयां की।
आपको बता दें कि मेहराजी उस समय दक्षिण पश्चिम एयर कमांड के कमान्डर थे। कई राज्यों के सीमक्षेत्र वाली इस एयर कमान्ड का मुख्यालय गांधीनगर है।अपने मोदीजी को भी शायद इस मुद्दे की आशंका थी। तपाक से बोले, मेहराजी आपके फौजी सस्ती दारु को बाहर ब्लैक में बेचते हैं। आपकों यह तो मालूम होगा कि गुजरात में दारुबंदी है। मेहराजी बोले ऎसी बात है। और एक फौजी कमान्डर से गुजरात के कमान्डर ने वादा किया कि वे देखेगें कि इस प्रकार की घटना न हो। इस समझौते ( हां जी एमओयू ) के तहत फौजियों की शराब सस्ती हो गई।
मेहरा ने मुख्यमंत्री के चैम्बर से बाहर निकल विंग कमान्डर टी के सिंगा को कहा कि देखो किसी सिवीलियन को दारु नहीं। बेचारे सिंगा क्या करते ? आदेश जारी हो गये। सबसे बडी समस्या सिंगा के लिये हुई ! उन्हे जनसम्पर्क अधिकारी के रुप में आये दिन पत्रकारों से पाला पडता था। पर फौज तो फौज है और सिंगा पहले फौजी फिर पीआरओ !
यह प्रथा नौ सेना में भी आ गई। उसका करण था उसके कमान्डर उत्पल वोरा का गुजराती होना। पहला गुजराती कमान्डर जैसी दर्जनों सुर्खिया बटोरने वाले वोरा ठहरे गुजरात के व्यापारी ब्रेन। उन्होने मध्यम मार्ग ढूंढ निकाला। नौ सेना के जहाज पर पत्रकारों को दारु पिलाओ। गुजरात की दारु बन्दी समुन्द्र में तो नहीं लगती।पर अपने भाई लोगों को दारु पीने वोराजी के जहाज पर पोरबन्दर जाना पडे़ ! बार बार यह थोडे ही सम्भव है।

योगेश शर्मा अहमदाबाद की मीडिया में अपनी बेबाकी के लिए और तल्ख़ सवाल पूछने के लिए जाने जाते हैं.. इस लेख में उन्होंने अपनी ही बिरादरी पत्रकारों की दुखद स्थिति पर लिखा है की कैसे मोदी के "राज" में उन्हें आर्मी भी दारू नही पिला रहीं है। पत्रकारों को अपने हलक तर करने के लिए गुजरात से बाहर जाना पड़ता है। येही वजह है की आजकल पत्रकारों की स्टोरी में क्रिएटिविटी नही आ रही है। मैं गुजरात के तमाम मित्रों का दुःख समझ सकता हूँ...और उनके दुःख में शामिल भी हूँ... स्टोरी कुछ महीने पहले लिखी थी लेकिन समय मिले तो चंडीगढ़ ज़रूर पधारिये , यहाँ आप सबको प्रेस क्लब तो लेकर जा ही सकता हूँ...आग्रह है इस स्टोरी को हलके दिमाग के साथ पढियेगा..... आपका शुभचिंतक , ब्रज मोहन, चंडीगढ़

Monday, October 20

अमन को खतरा....
आमतौर पर हिन्दुओं और मुसलमानों का एक दूसरे के त्यौहारों में शिरकत करना हमारी सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है। कट्टरपंथी ताकतें चाहती हैं कि सालों से चल रहे इस रिवाज़ पर रोक लगे। समाज में नफरत बढ़े। इस साजिश को समझना ज़रूरी है। मेरे एनडीटीवी ख़बर पर लिखे गए इस आलेख को ज़रूर पढ़ अपना विचार साझा करें.....नीचे लिंक दिया जा रहा है।
http://khabar.ndtv.com/2008/10/20163245/Brij-maohan.html

Monday, October 6

शहीदे-आज़म भगत सिंह को बख्श दें ....
भगत सिंह की जन्म शती पर जारी किए गए सिक्के पर कई सियासी पार्टियाँ राजनीति करना चाह रही थी, लेकिन भगत सिंह के सगे भतीजे ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। अगर कोई पार्टी भगत सिंह को लेकर बेकार का बवाल करना चाहती है तो उसका कोई मतलब नही है....
मैंने भी अपने पिछले पोस्ट में लिखा था की भगत सिंह पर राजनीति न करें। भगत सिंह भगत सिंह रहेंगे...चाहे वोह टोपी में रहें की पगडी में...भगत सिंह के छोटे भाई बलबीर सिंह के बेटे अभय सिंह ने ख़ुद ये ख़त लिखा है....
"मुझे खुशी है की भारत सरकार ने भगत सिंह की सच्ची तस्वीर से मिलता जुलता हुआ सिक्का ही जारी किया है। इसके बारे में जिसने भी विवाद खड़ा करना चाहा वो ग़लत था। पगड़ी पहने भगत सिंह की तस्वीर ज्यादातर कलाकारों की कल्पना है।
लेकिन मैं भारत सरकार से अपील करना चाहता हूँ की भगत सिंह की जन्म शती पर जारी किए गए सिक्के सिर्फ़ म्यूज़ियम की शोभा न बढाये। आम लोगों तक भगत सिंह के सिक्के पहुंचे, इसकी भारत सरकार को कोशिश करनी चाहिए। मैं उम्मीद करता हूँ की भारत सरकार इन सिक्कों को भारी संख्यां में बनाये जायें ताकि भगत सिंह के चाहने वाले आम लोगों तक भगत सिंह की सही तस्वीर पहुँच सके...
आपका ही,
अभय संधू, भगत सिंह का भतीजा

Thursday, October 2

गांधीजी के प्रिय भजन

वैष्णव जन तो तेने कहिये,जे पीड पराई जाणे रे।।
दृखे उपकार करे तोये,मन अभिमान न आणे रे।।
सकल लोकमां सहुने वंदे,निंदा न करे केनी रे।।
वाच काछ मन निश्चल राखे,धन-धन जननी तेनी रे।।
समदृष्टी ने तृष्णा त्यागी,परत्री जेने ताम रे।।
जिहृवा थकी असत्य न बोले,पर धन नव झाले हाथ रे।।
मोह माया व्यापे नहि जेने,दृढ वैराग्य जेना मनमां रे।।
रामनाम शुं ताली लागी,सकल तीरथ तेना तनमां रे।।
वणलोभी ने कपटरहित छे,काम क्रोध निवार्या रे।।

भणे नरसैयों तेनु दरसन करतां,कुळ एकोतेर तार्या रे।।

Wednesday, October 1

आतंक से लडने का तऱीका ग़लत

आतंक से लडने का तऱीका ग़लत
एक अखबार में खबर पढी कि नोएडा की एक मल्टीनेशनल कम्पनी ने अपने एक आई टी इंजीनियर को दरवाज़े से वापिस भेज दिया क्योंकि वो इस्लाम धर्म से ताल्लुक रखता था।
पंजाब के जालन्धर शहर में पिछले हफ्ते एक महिला शिक्षिका को उसके मुस्लिम होने कि वजह से नौकरी खोनी पडी। स्कूल मैनेजमेंट ने उसे स्कूल आने से मना कर दिया।
ये शायद इस तरह की पहली घटना नहीं रही होगी। इस तरह की जल्दबाज़ी से हम देश और समाज का फायदा नहीं नुकसान कर रहे हैं।सोचने का वक्त है। ग़ौर करने का वक्त है।
हर मुस्लिम आतंकवादी नहीं हो सकता। मालेगांव में विस्फोट से पहले एक मुस्लिम दुकानदार ने पुलिस को पहले ही बता दिया था कि थाने से कुछ ही दूरी पर एक लावारिस मोटर साइकल पडी है। पुलिस ने सुचना मिलने के बाद भी काम नहीं किया। नतीज़ा कई बेकसूर लोगों कि मौत। ये महज़ एक बानगी भर है। मान लेते हैं कि पूरी दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद का ज़ोर बढता जा रहा है। लेकिन उस हिसाब से हमारा खुफिया सूचना तंत्र काम नहीं करता। और न ही हमारा तरीक़ा सही है, आतंकवाद से निबटने का।हर मुस्लिम को आतंकवादी का मास्क पहना देना ग़लत है।
पंजाब ने भी १० साल से ज़्यादा आतंक का दंश झेला, लेकिन आतंकरूपी रावण को तभी मात दिया जा सका, जब यहाँ के लोगों ने दहशतगर्दों का फन कूचला।
आज संकट ज़्यादा बडा है। ये काम सिर्फ पुलिस का नहीं है, कुछ मुट्ठी भर अधिकारियों का नहीं है। समाज के सारे वर्गों को एकजुट करके आतंक को मात दिया जा सकता है। हाँ ये ज़रूर है कि हमारी ज़िम्मेदारियाँ बढी है। चाहे हम हिन्दु हों या मुसलमान।