Thursday, November 6

हम नेता, हमें रोने से तो न रोकिये

ये बदले ज़माने का दस्तूर है.
जब धमाके में मरने वालों की गिनती हमें नहीं डराती है.
खून के कतरे देख हमें आक्रोश नहीं होता है .
शहीदों के माँ-बाप के गुस्से हमें बेमानी लगते हैं...
मौत हमें सस्ती लगने लगती है।
हम माँ बाप के मुहब्बत को तोलने लगते हैं।
लाखों में, करोडों में
हम रोटियां सेंकने लगते हैं
हम आंसू बहाने लगते हैं
हम हंसने लगते हैं
कभी हम गालियाँ बकने लगते हैं।
कभी हम मुस्कुराने लगते हैं
हम नेता हैं कांग्रेस, बीजेपी, शिव सेना, कम्युनिस्ट
सब जगह हम मौजूद हैं।
हम तो वोट के मारे हैं।
कभी कब्र पर चढ़कर भी सियासत करते हैं।
कभी शमशान में भी दो फूल चढा आते हैं।
सियासत के लिए हम खुनी को भी मुआफ करते हैं
हम तो आपके नेता हैं।
गलती हमारी नही है
गलती तो आपकी है
आप ही तो मुझे बार-बार चुनते हैं
फ़िर हमें ही गालियाँ बकते हैं।
हमें मुंबई में जनता ने ताज जाने से रोका है
इतना बड़ा हादसा है...
कल देखा, आज भी देखा
हमारी तस्वीर अख़बार से पूरी तरह से गायब है
यकीन मानिये हमारा दिल जार-जार रोया है।
हम तो नेता हैं,
हमें तो रोने से न रोकिये
फूल चढाने से न रोकिये
फ़िल्म बनाने से न रोकिये
वोह देखिये न
कौन है वोह लाल-लाल होठों वाली नारियां
जो मोम बत्तियां जलाकर
नेताओं से बार बार सवाल कर रही हैं,
जाँच करवाइए
पाकिस्तान की साजिश लगती है।
आईबी को बुलाइए
भाई हमारे पेट पर लात तो न मारिये
समझिये षडयंत्र है
नेता तो पतीत पावन हैं
हम तो सीना चीर कर भी दिखला दें
लेकिन एक मौका और तो दीजिये
अगला ब्लास्ट जब होगा देख लेंगे
मौत की सज़ा हमारी पार्टी को तो न दीजिये
हम नेता, हमें रोने से तो न रोकिये

सामाजिक सरोकारों का ग्रन्थ, श्री गुरु ग्रन्थ साहिब

ब्रज मोहन सिंह
चंडीगढ़
सामाजिक सरोकारों का ग्रन्थ, श्री गुरु ग्रन्थ साहिब
गुरु ग्रंथ साहिब के सामने नतमस्तक होने के लिए आपका सिख होना ज़रूरी नहीं... आप अगर इस महान ग्रंथ के सामने मत्था टेकते हैं तो आप पूरे हिन्दुस्तान की साझी विरासत, साझी सोच को नमन करते हैं, जिसमें 30 संतों और 10 गुरुओं की वाणी का सार समाहित है। सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसी गुरु की महिमा का बखान नहीं है, बल्कि ईश्वर के नाम का सिमरन करने, सार्वजनिक जीवन में शुचिता रखने, नैतिक मूल्यों को कायम रखने और जनसेवा करने का संदेश है।
http://khabar।ndtv।com/2008/11/04182213/ColumnBrajmohan041108।html

Monday, November 3

पत्रकार हो... खाओ, पियो

पत्रकार हो, देखकर लिखो
देखकर लिखो, देखकर बोलो।
देखकर चलो।
देखकर देखो कि आप जो दिखा रहे हो वोह सरकार को देखना है की नही।
आप जो दिखा रहे हो, वोह दिखना भी है कि नही।
आप जो लिखने की सोच रहे हो, उस ख़बर को लिखना है भी कि नही
आप जो लिखोगे वो इसलिए ग़लत है
कि तुम इस खेल को समझ सकते नही।
कि तुम्हारी
मति मरी गयी है
घास चरने गयी है
आप समझते हो आप को सबसे बड़ा विचारक
समाज सुधारक
आपकी डिग्री की है क्या औकात
आप तो उस पनवाडी से भी गए गुजरे हो,
जो पान बेचने के लिए किसी कि इजाज़त नही लेता।
फटेहाल, कंगाल किस चीज़ का गुमान करते हो
एक केस में फंसा दिए जाओगे।
होश ठिकाने आ जायेंगे
एक पव्वा भर पीने के बाद ज्ञान बघारने हो
जज्बाती बन जाते हो सच उगलने लगते हो।
उल्टियाँ करने लगते हो।
क्या पता तुम्हे कैसे हजम करना होता है
पूरा का पूरा समुद्र
हम नेता हैं देश के विधाता है,
शर्म घोलकर पी चुके हैं,
पत्रकार हो... खाओ, एक पेग और पियो
झांको मेरी आँखों में
आम आदमी की तस्वीर दिखायी देगी
अरे कितने भोले हो तुम
मैं ही हूँ उनका सच्चा साथी, हमदर्द
और तुम भी तो मेरे अपने हो
फिर तुम कैसे जा सकते हो मेरे खिलाफ, आम लोगों के खिलाफ
आखिरी पेग तैयार है......खाना भी तैयार है...
तुम पत्रकार भी न बक बक करते रहते हो...
एक पेग पिला दो तो कितने अच्छे हो जाते हो....
तुम भी न पत्रकार ही रहे...