Wednesday, December 31

कोई न्यू ईयर रेज़ोलुशन नही....


बचपन से ही न्यू ईयर रेसोलुएशन बनाने की आदत रही है। आज सुबह-सुबह मैं अपने दिल की बात कहना चाहता हूँ । मैं भी उन हजारों, लाखों में था, जो ये सोच रहा था कि नए साल में कोई मद्यपान नही। बहुत हो गया। लेकिन अब दोबारा सोच रहा हूँ। इसकी वजह भी है।
"जल्दबाजी में कुछ न करें," ऑस्ट्रेलिया में न्यू साउथ वेल्स के एक स्टडी में कहा गया है. नए साल पर शराब छोड़ने का फ़ैसला काफी सोच-समझ कर करें. इसके कई साइड इफेक्ट हो सकते हैं.वैसे लोग जो हर दिन शराब पीने के आदी हैं उनको उल्टियां आ सकती हैं, सर में चक्कर आ सकता है, शरीर में क्रेम्प आ सकते हैं. इसलिए फ़ौरी तौर पर फ़ैसला लेने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर बात कर लें.
साल के आखीर में भी अगर आप अच्छे काम करने का ख्याल रखते हैं तो उसको भी आज के मेडिकल साईंटिस्ट सही नही मानते हैं. यह भी एक ऐसी सच्चाई हैं जिसे आपको नही मान कर भी मानना पड़ेगा.
तो फिलहाल दोस्तों ऐसा कुछ नही कर रहा हूँ जिससे कि सेहत पर ख़राब असर पड़े। सब कुछ होगा लेकिन लिमिट में रहकर। जो करना है करिए लेकिन कंट्रोल में रहकर. अब और ज़्यादा ज्ञान नही बघारूंगा. नए साल से पहले फिलहाल इतना ही. सारे दोस्तों को ढेर सारा सलाम. मिलेंगे साल २००९ में.
शुक्रिया मेरे ब्लॉग पर पधारने का। अपना ढेर सा ख्याल रखियेगा।

Monday, December 29

उफ़ कितनी बड़ी धरती है।

अपने कंधे पर
सतरंगे ख्वाबो को झोले में भर
हम निकल पड़ते हैं
अपने गांव को छोड़
शहर में, फ़िर महानगर में
पहाडों पर, बियाबान में
तलाशते, टटोलते, भटकते
मारे-मारे फिरते, बिना थके, बिना रुके
अनंत और, और कितनी दूर
फ़िर हमारे अन्दर गांव जिंदा होने लगता है।
देह कहता है, थक गया हूँ,
मन कहता है, लौट भी आओ
आत्मा कहती है, बस भी करो
लौट आओ
अपने बगीचे के लिए,
सुबह की धूप के लिए।
अपने तालाब के लिए, झरबेरी के पेढ़ के लिए
चोटी सी गोरैया के लिए,
लौट आओ, लौट भी आओ।
कितने साल हो गए हैं,
घर के चूल्हे पर सिंकी गरम-गरम रोटी खाए
कहाँ भाग रहे हों फाइव स्टार होटलों, बार और पबों में
अपने खेत में पैदा हुयी धनिया की चटनी
और भतुआ साग खाने में जो मज़ा है
वोह कहाँ है दुनिया भर के खाने-खजाने और जायके में
कहाँ जा रहे हो लौट भी आओ।
मैं भी न कब से भाग रहा हूँ ?
उफ़ ये कितनी बड़ी धरती है।

Sunday, December 28

युद्ध की बात बेमानी

पाकिस्तान ने दुनिया भर से मौत के सामान जमा कर लिए हैं। बहुत सारे आतंकी कैंप बना लिए हों लेकिन लोगों की ज़िन्दगी बचाने के लिए वहां ढंग के हस्पताल नही बन पाए हैं।
मेरी मुलाकात पिछले दिनों सरहद के उस पार पाकिस्तान से आए जावर हुसैन (तस्वीर में) से हुयी। वो इस उम्मीद में हिंदुस्तान आया था कि उसके दोनों कटे हुए हाथ वापस मिल जायें।
चंडीगढ़ के पास जीरकपुर में आकर वाकई उसके दोनों हाथ लगा दिए गए. इसी साल उसके हाथ गेहूं की पिराई करते हुए कट गए थे. गरीब माँ-बाप के पैसे नही थे कि अमेरिका जाकर १० लाख रूपये खर्च करके हाथ लगवा सकते. जबकि यहाँ यह काम महज़ कुछ हज़ार रूपये में हो गया. दूसरे विश्व युद्ध में भारतीय सेना में काम कर चुके लेफ्टिनेंट वोहरा ने इस सेंटर की नींव रखी थी. पहले नकली हाथ और पैर पुणे में बनाये जाते थे लेकिन जीरकपुर में १९७२ से ये प्रोस्थेटिक सेंटर चल रहा है जिसमें नकली हाथ और नकली पैर लगाये जाते हैं. तकनीक बिल्कुल देशी है. इसलिए खर्च कम आता है।
जावर हुसैन की उम्र महज़ १७ साल थी. उसने उम्मीद खो दी थी। शायद उसके हाथ फ़िर कलम थाम सकें।
नेवेदक प्रोस्थेटिक सेंटर ने जावर हुसैन जैसे ज़िन्दगी से नाउम्मीद तकरीबन ६०,००० को नयी ज़िन्दगी और चेहरे पर ढेर सारा मुस्कान दिए हैं. आपको यह बता दूँ की पूरे पाकिस्तान में इस तरह की कोई सुविधा नही है कि वहां कटे हुए हाथ लगाये जा सकते हों. कराची, लाहौर, इस्लामाबाद...कहीं भी यह सुविधा नही है. मुझे साफ़ तौर पर ये लगा कि भारतीय उप- महाद्वीप में ढेर सारे हस्पताल लगाये जाने चाहिए. आज दोनों मुल्कों के लोग लड़ाई की बात करते हैं लेकिन मेरी रूह सिहर जाती है कि अगर दोनों मुल्कों में बड़ी ज़ंग होती है तो कितने लोग अपांग हो जायेंगे, बच्चे बेसहारा हो जायेंगे। लाखों लोग बेशक मारे जायेंगे. आणविक युद्ध जैसे भयावह विनाश की तो आप महज़ कल्पना ही कर सकते हैं. हिरोशिमा और नागाशाकी में तीन-चार पीढियों के बाद भी apang बच्चे पैदा हो रहे हैं।
इस लेख को पढने वाले लोग ज़रूर इस सेंटर को मदद करें. अगर आपके घर के आस-पास में ऐसे लोग हों जिन्हें नकली हाथ-पैर की ज़रूरत हो तो उन्हें बताएं...मैं पता दे रहा हूँ...
Daulat singhwala,zirakpur (पंजाब)Near airport chowk , chandigarhPhone: 0176-2950980172-2747966email:

Wednesday, December 24

मुझे ऐक्ट्रेस नही, डॉक्टर बनना है पापा....

मेरी बेटी मुझसे अक्सर सवाल करती है,
कि हर दिन टीवी चैनलों पर आतंकवादी क्यों आते रहते हैं,
हथियार लेकर,
उनकी कौन सी दुनिया है,
जहाँ से वो आते हैं,
हमारी दुनिया को बर्बाद करने,
क्या दुश्मनी है उनको हम सबसे,
पूछती है...पापा वोह भी तो हमारी तरह ही हैं...
पर कौन सा स्कूल जाते हैं वोह
कौन सा, कैसा गन्दा टीचर है उसका,
जो उनको कभी पनिश नही करता,
सिखाता नही है
हम तो कुछ बदमाशी नही भी करते हैं
फ़िर भी मिस निकालती है बड़ी बड़ी आंखें...
किसी से कोम्प्लैन करो, बदल दो उनके स्कूल,
या तो मैं ही शिकायत करूंगी बड़ी मिस से।
बदमाश हैं
भले ही मारा गया।
लेकिन पापा अब मैं तो कभी नही जाऊंगी मुंबई
मुझे ऐक्ट्रेस नही, अब तो खूब पढ़ना है.
मुझे डॉक्टर बनना है।
और लोगों का इलाज़ करना है...

Tuesday, December 23

अंतुले की गीदड़ भभकी में फंस चुकी है कांग्रेस

आज मन बहुत अशांत है। ख़ुद से कोफ्त हो रही है। एक नागरिक के तौर पर ख़ुद को असहाय महसूस कर रहा हूँ। मैं सोच चुका था की अंतुले पर लिख कर अपने ब्लॉग को गन्दा नही करूंगा। लेकिन क्या करुँ? चुप कैसे रहूँ ?
ऊपर से लग रहा है कि देश हित के मुद्दे पर हम एकजुट हैं लेकिन नीचे का आधार दरक रहा है। आज सुबह सुबह अख़बारों पर नज़र गयी तो एक बात मेरे दिमाग में कौंध रही थी कि आखिर क्या हम झंझावातों के खिलाफ चट्टान की तरह खड़े होने की हिम्मत रखते हैं। यह सवाल मैं ख़ुद से पूछ रहा हूँ। पूरे देशवासियों से पूछ रहा हूँ।
कल मैं संसद में हो रहे बहस को देख रहा था। कांग्रेस यह तय नही कर पा रही थी कि अंतुले के बयां पर क्या रुख अपनाया जाए। अंतुले जितना नुकसान कर सकते थे, कर चुके हैं। देश का तो अंतुले ने तो अहित किया ही, कांग्रेस को भी न घर का छोड़ा न घाट का। अंतुले का पाप न छिपाते बन रहा है और न ही ज़ाहिर करते।
अंतुले आज पाकिस्तान में जिहादियों के हीरो बन चुके हैं। पाकिस्तान उसे मुस्लिमो का सच्चा हीरो कह रहा है..हिंदुस्तान की मिटटी में पैदा होकर उन्होंने वोह सब कुछ किया है जिसपर देशभक्त मुसलमानों को फख्र नही हो सकेगा। कांग्रेस को हिम्मत नही है कि वोह अंतुले जैसे घिनौने लोगों को पार्टी से निकाल दें।
कई लोग कह रहे हैं कि अंतुले के खिलाफ देशद्रोह का मामला चलना चाहिए...मैं भी इस राय से इतेफाक रखता हूँ। आखिरकार जब जांच चल रही हो तो उसके बीच मैं "अनुमान" के आधार पर बकवास करने का क्या औचित्य है। १८८५ में बनी कांग्रेस की सियासत वोट को लेकर चलती रही है। तभी अंतुले जैसे दो पैसे के लोग १०० साल से पुरानी पार्टी को धता बताकर अभी भी कैमरा के सामने खड़ा होने की जुर्रत करते हैं।
सोनिया अंतुले की गीदड़ भभकी में फंस चुकी है।अंतुले हिंदुस्तान में वोट की राजनीति का प्रतीक है। उस जैसे लोग ही अतीत में पाकिस्तान बनने के लिए जिम्मेदार रहे हैं। और अगर पाकिस्तान जैसा मुल्क जिंदा है तो उसमें अंतुले का बहुत बड़ा हाथ है। मुझे लगता है की अंतुले जैसे लोगों अगर कांग्रेस में बने हुए हैं तो हमें लड़ाई करने की बात नही करनी चाहिए. क्योंकि दुश्मन जब घर में ही है, लड़ाई की बात करनी भी बेमानी है.

Saturday, December 20

राधा की मोहन

प्यार हिम्मत देता है। प्यार डर भी देता है।प्यार दर-दर भटकने को मज़बूर करता है। प्यार करने वाला कुछ समझता नहीं है। प्यार करने वाला सब कुछ समझता है। प्यार सब कुछ लूट लेता है। प्यार करने वाला सब कुछ लूटा देता है। प्यार करने वाला पागल होता है। प्यार बेहया बना देता है।प्यार बगावत करने को मजबूर कर देता है।
हरियाणा के उपमुख्यमंत्री रहे चंद्रमोहन ने अपने मन के मीत अनूराधा बाली से निकाह करके ये बता दिया कि प्यार करने की कोई ऊमर नहीं होती है।
प्यार के लिये चंद्रमोहन चांद बन गया और अनुराधा फिज़ा। चांद ने सब कुछ निछावर कर दिया। सब कूछ लूटा दिया।
अपनी सियासत, अपनी हैसियत, अपना रुतबा और अपनी कुर्सी। प्यार किया तो डरना क्या?
पहले जो वह मरसिडीज़ कार में अपने कमांडो के साथ घूमता था। अब वो फिज़ा को सेन्ट्रो कार में बिठाकर खुद गाडी चलाता है।
वक्त बदलता रहेगा। लेकिन प्यार की लौ जलती रहेगी। प्यार करने वाले किरदार ज़रूर बदल जायेंगे।
गालिब ने भी खूब लिखा कि किस तरह प्यार करने वाला बहार में हंसा। ख़िज़ा में रोया, मारा-मारा फिरा। इश्क की ये आग ऐसी है जो ना आसानी से लगाये लगती है, न बूझाये बनती है।
"इश्क पर ज़ोर नही है वह आतिश ग‌़ालिब,
जो लगाये ना लगे और बुझाये ना बने।"
लैला, मज़नूं, सिरी और फरहाद ने दुनिया की ऐसी की तैसी की। खुद की भी ऐसी की तैसी कर ली। मीरा ने अपने मोहन के लिये हलाहल पिया। बेचारी राधा वन-वन भटकती रही। बाबली बनकर। लोग राधा को देवी मानते हैं।राधा का नाम लोग कृष्ण से पहले लेते हैं।
पंजाब के मशहूर कवि धनीराम चात्रिक ने लिखा है,
"इस इश्क दी चल्लेगी बात उत्थे।
जित्थे चार बंदे मिल बहण्गे नी।
कडे कुबजां नूं किसे ने पुछणा नहीं,
राधा आख फिर कृष्ण कहणगे नी।
जब भी मोहन की बांसुरी बजी। सभी गोपियाँ दौडी चली आईं। कौन रोक पाया गोपियों को जब मोहन की बांसुरी बजी।
पारो के प्यार में देवदास ने अपनी दुनिया में ही आग लगा ली। सब कुछ राख हो गया। खूद देवदास भी।
वक्त गवाह है। चन्द्रमोहन ने अपनी पहली पत्नी और बच्चौं को त्याग दिया। उसे पूरी तरह से पता था कि बगावत का अंजाम क्या होगा। भजनलाल संपत्ति से बेदखल कर देंगे। घर परिवार वाले उस पांच सितारेनुमा घर में उसे नहीं घुसने देंगे।
अब चाँद के सामने बहुत बडी मुसीबत है कि वो ४३ साल की उम्र में नई ज़िंदगी की शुरुआत करेंगे।नई राजनीति की शुरुआत करेंगे।क्या उनकी विधानसभा के लोग इस बातको मान लेंगे कि उन्होंने निज़ी ज़िन्दगी में जो कुछ भी किया वो ठीक किया।
शायद पहले ऐसे नेता नहीं हैं जिन्होंने दूसरी महिला से शादी करने के लिये अपना धर्म बदल कर इस्लाम कबूल कर लिया। सबसे पहले हमारे ज़ेहन में अभिनेता धर्मेन्द्र देओल का चेहरा आता है, जिन्होंने १९७९ में ड्रीमगर्ल हेमामलिनी से शादी करने के लिये इस्लाम कबूल कर लिया। उनकी पहली शादी प्रकाश कौर से हुई थी। जिससे सन्नी देओल और बाबी देओल पैदा हुए। धर्मेन्द्र बाद में दिलावर खान और हेमा आयशा बी बन गये। शादी से पहले धर्मेन्द्र जाट थे और इनका पूरा परिवार आर्यसमाजी था। २००४ में बीकानेर की जनता ने धर्मेन्द्र को संसद पहुँचा दिया। यहाँ उनका जाट कार्ड खुब चला। ये दीगर बात है कि उनके हल्के के लोग आजकल उनसे इसलिये खफा हैं कि वो बीकानेर जाते ही नहीं हैं।
शर्मीला टैगोर टाइगर मंसूर अलि खान पटौदी से शादी करने के लिये आयेशा सुल्ताना बन गयी। सदाबहार गायक किशोर कुमार मधुबाला (वो मुस्लिम थी) से शादी करने के लिये करीम अब्दुल बन गये। कितने लोगों को याद है कि किशोरदाका नाम करीम अब्दुल भी है।
हिन्दी की बहुत सी फ़िल्मों में औरत और पर-पुरुष के रिश्तों को बखूबी दिखलाया गया है। महेश भट्ट की "अर्थ" का कथानक यही है। एक और फ़िल्म इजाज़त का खास तौर पर ज़िक्र यहाँ करना लाज़मी है, जिसमें गुलज़ार ने अपने गीतों के ज़रिये बहुत ही खु़बसूरती से स्त्री और पर-पुरुष की कहानी को दिखाया है।
भारतीय राजनीति में ऐसे किरदारों की कोई कमी नहीं है जो दोहरी ज़िन्दगी जीते रहे हैं। अटल बिहारी बाजपेयी कहते रहे कि वो शादी-शुदा नहीं हैं लेकिन कुंवारे भी नहीं हैं। जार्ज फर्नानडिज़ भी जया जेटली के साथ सालों से लिव-इन- रिलेशनशिप में रह रहे है। पंजाब के पुर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरींदर सिंह तो लाजवाब हैं।उनके पाकिस्तान की पत्रकार अरूसा आलम के साथ रिश्तों की बात खुलकर सामने आयी। अरूसा तो अमरींदर के पाटीयाला के मोतीबाग पैलेस में भी हफ्ते भर से ज़्यादा रही। लेकिन कैप्टन की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। उनकी पत्नी और पाटियाला से सांसद रही परणीत कौर भी पूरे मामले पर चुपचाप ही रहीं।
चन्द्रमोहन ने ऐसा कुछ नहीं किया। वो नैतिकता का लबादा नहीं ओढे रहे। प्यार किया तो खुलकर किया। दुनिया जाये भाड में।
शादी की खबर मिलते ही हरियाणा के मुख्यमंत्री ने अपने केबिनेट साथी को बाहर का रास्ता दिखा दिया। शायद वो एक बडे विरोध की कल्पना कर रहे थे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
अभी जब मैं ये सब कुछ लिख रहा हूँ तो मुझे फतेहाबाद से एक रोचक खबर मिली कि वहाँ एक मुस्लिम लडके ने एक हिन्दु लडकी से भागकर शादी कर ली।अलि हसन अजय बन गया। वो पहले से शादी शुदा है, दो बच्चे भी हैं। लकिन प्यार की कोई दवा नहीं है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुये उसे सुरक्षा दे दी है। वो वापस गांव लौट गया है।
अदालत को देखना चाहिये कि अगर चन्द्रमोहन को सुरक्षा की ज़रूरत हो तो ज़रूर मुहैया करायी जाए।ये शादी करने वालों के विवेक पर छोड देना चाहिये कि वो इस्लाम या हिंदू धर्म क्यों स्वीकार कर रहे हैं?
ज़ाहिर है प्यार करने वाले किसी की नहीं सुनेंगे। प्यार करने अपने दिल की ही करेंगे।प्यार करने वाले झुठ बोलते रहेंगे। इसमें कोई शक नहीं कि शादी करने की ख़ातिर इतने सारे लोग मुसलमां बने। इसमें क्या गलत है, और क्या सही है इसपर बहस भी चलती रहेगी।

Friday, December 19

अंतुले को तो जाना ही था
शुक्रिया प्रधानमंत्री का जिन्होंने अल्प संख्यक मामलों के मंत्री ए आर अंतुले को चलता किया। मुझे हिंदुस्तान का एक नागरिक होने की वजह से इस बात से सख्त आपत्ति थी कि अंतुले इतना बकवास करके भी मंत्री कैसे बने रहंगे।
खुशी है कि कांग्रेस सरकार ने कम से कम इतना समझ लिया कि अंतुले जैसे लोग बकवास करके मंत्री नही बने रह सकते। आखिर ये सवाल देश हित का है। देश के इमेज का है।
इस लेखक ने अपने पिछले रिपोर्ट "क्या अंतुले मंत्री बने रहेंगे" में इस बात पर साफ़ ऐतराज़ किया था कि अंतुले को मंत्री पड़ से इस्तीफा दे देना चाहिए। शायद यही राय पूरे देश की थी। पूरे संसद की थी. आज जब सुबह-सुबह इस बात की मुझे टीवी के ज़रिये ख़बर मिली कि अंतुले को जाना पड़ा है, यकीनन मुझ जैसे लोगों को अच्छा लगा.
यह एक चेतावनी है बकवास करने वाले नेताओं के लिए कि देश हित के मुद्दे पर वोह सोच समझ कर बोलें. राजनीति अगर देश की सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर बोलकर चमकाने की कोई कोशिश होती है तो उसका जवाब माँगा जाना बेहद लाज़मी है. मैं तो यही कहूँगा कि अगर मनमोहन सिंह सरकार पहले ही सख्ती से काम लेती तो ये दिन न देखना पड़ता. लेकिन देर से ही सही प्रधानमंत्री ने सही कदम उठाया है. . मुझे लग रह है कि उन्हें देश कि नब्ज़ का थोड़ा थोड़ा अंदाजा लगने लगा है.इसके लिए वोह साधुवाद के पात्र हैं.

Thursday, December 18

क्या अंतुले मंत्री बने रहेंगे???
देखते रहिये सियासत का गन्दा खेल....अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री एआर अंतुले को हेमंत करकरे की मौत के पीछे हिंदू आतंकवादियों का हाथ नज़र आता है। क्योंकि करकरे मालेगाँव ब्लास्ट की जांच कर रहे थे...
अंतुले का क्या किया जाए? क्या वोह सठिया गए हैं..ऐसे लोगों को क्या कहते हैं?
मुंबई की पुलिस, हमारी सुरक्षा एजेन्सी सब ये कह रही हैं कि करकरे पाकिस्तानी आतंकवादी के हाथों मारे गए...भारत इस बात को लेकर सुरक्षा परिषद् में भी गया। बहुत कम मौके पर हिंदुस्तान ने ऐसा किया है।
आख़िर अंतुले किस मिटटी के बने हैं???
क्या उनको राजनीति में रहने का अधिकार है?
क्या उनको मंत्री बना रहने चाहिए??
कौन जवाब देगा?
कौन है जवाबदेह? इस बात का पता चल गया है कि हिंदुस्तान का जितना बड़ा दुश्मन पाकिस्तान है, उससे कहीं बड़ा दुश्मन यहाँ के हमारे नेता ही हैं।
अंतुले यह बोलकर किसको खुश कर रहे हैं। पाकिस्तान को? आई एस आई को? बताइए क्या अंतुले शहीदों कि शहादत का अपमान नही कर रहे हैं?
दो घटनाओं का ज़िक्र यहाँ करना बेहद ज़रूरी हो गया है....कि कैसे हमारी व्यवस्था देशहित को ताक पर रखकर हमारे सियासी हुक्मरानों के इशारों पर काम कर रही है...
*पहली घटना मुंबई हादसे से पहले की है। मालेगाँव से पहली इंटेलिजेंस और पूरी महाराष्ट्र सरकार प्रज्ञा ठाकुर के पीछे लग गयी। आतंकवादियों की खोज में। इसके पीछे यह आशय निकाला गया कि आतंकवादी सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय के बीच से ही नही हिंदू समुदाय के बीच से भी हो सकते हैं। इस बात पर किसी को ऐतराज़ नही रहा है। आतंकवादी किसी भी मज़हब से हो सकते हैं। भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत उनको सज़ा मिलनी चाहिए। बगैर किसी भेदभाव के। राष्ट्रहित में यह ज़रूरी हो गया है। इस मुद्दे पर अगर राजनितिक पार्टियाँ रोटियां सेंकती है तो इसका हिसाब जनता नेताओं से ले सकती है।
दूसरी घटना मुंबई की। जब सभी इंटेलिजेंस एजेंसियां पूरी तरह से नींद की आगोश में सोये हुए नज़र आयी। १०० से ज़्यादा हिन्दुस्तानी और विदेशी नागरिक मारे गए। केन्द्र सरकार, विपक्ष सभी संसद में एकजुट हुए इस मुद्दे पर कि आतंक को साथ मिलकर हराया जाए।
लेकिन दुःख होता है कि कुछ अंतुले जैसे नेता गन्दी राजनीति कर रहे हैं. और ऐसा कहकर भी अंतुले मंत्री बने रहेंगे. सियासत का यह भद्दा चेहरा आपके और हमारे सामने है।
देखते रहिये. सियासत के गंदे खेल को. हमें तो शर्म आती है कि ऐसे लोग हमारे नेता हैं। बेक़सूर लोग मारे जा रहे हैं और इन्हें वोट की पड़ी है।

Saturday, December 13

निम्बू की चाय और वर्ग-भेद
दशरथ साहू की उमर ४० साल से ज़्यादा नही लगती है लेकिन ये अपनी उमर ५० से पार बताते हैं. रांची में रातू रोड पर गुरूद्वारे के साथ में इनकी चाय की दुकान होती थी. लेकिन दुकान अब वहां से थोडी सी हट गयी है १०० मीटर के करीब. दशरथ आदिवासी हैं. जब १० साल की उमर थी तभी से चाय की दुकान चला रहे हैं. पहले दूध की चाय बनाते थे अब लेमन चाय बनाते हैं. दशरथ कहते हैं की निम्बू की चाय यहाँ लोग ज़्यादा पसंद करते हैं. दो रूपये में चाय मिलती है..ऊपर से निम्बू के साथ काली मरीच का तड़का लगाते हैं. जिससे इसका स्वाद मुझे किसी भी फाइव स्टार होटल और बरिस्ता से भी अच्छा लगता है. पिछले दिनों जब में अपने परिवार के एक सदस्य की शादी में रांची गया तो कोलकाता से छपने वाले टेलेग्राफ अख़बार की खोज में रांची की सड़क का सुबह सुबह चक्कर लगा रहा था. वहीँ दशरथ पर मेरी नज़र पड़ी.
मैं लेमन टी का बहुत बड़ा फैन रहा हूँ और यहाँ देखकर मुझे ताज्जुब लगा की बहुत से गरीब तबके के लोग, सडकों पर दिहाडी करने वाले लोग, निम्बू की चाय चुस्की लेकर पी रहे थे. मुझे बहुत बड़ा सुकून मिला की निम्बू की इस चाय ने कितने बड़े वर्ग भेद को ख़तम कर दिया है.
मैंने भी एक चाय आर्डर की. फ़िर एक नही तीन ग्लास चाय पी. उसकी चाय ने मुझे कायल कर दिया. मैंने सोचा कि दशरथ के साथ अपनी एक फोटो खींचकर रख लूँ. उसे अच्छा लगेगा. नतीजा मुझे एक और चाय पीनी पड़ी.
सतही तौर पर तो मुझे ऐसा लगा कि उसकी अच्छी कमाई होती होगी, लेकिन जब पुछा तो उसने बताया कि उसके चार बच्चे हैं और कोई भी मिडल स्कूल से ज़्यादा नही पढ़ सका. दो बेटियों की शादी कर दी है, वोह नाना बन गया है. रातू रोड के साथ उसने ४०००० रूपये में ज़मीन लेकर दो कमरे का एक घर बना लिया है. पिछले ४० साल में उसकी कुल जमा कमाई यही रही है. दशरथ ने ४० साल में भले ही महज़ १०० मीटर का फासला तय किया हो. उसके बच्चे नही पढ़ सके, ये उसे गम है लेकिन वो बेहद खुश है की उसने अपनी मिटटी नही छोडी. उसको यहाँ की गलियां खुबसूरत लगती है.
४ रूपये में लिट्टी और चोखा खाकर वो आराम की नींद सो सकता है. हिंदुस्तान के किस हिस्से में ये सम्भव है? ५-१० रूपये में ४ रोटी और सब्जी उससे कहाँ मिलेगी ? यहाँ उसे नौकरी खोने का डर नही सताएगा. यहाँ उसे मंदी का डर भी नही सताएगा. दशरथ मेरी तरह मुंबई, दिल्ली और पंजाब नही जाएगा. वो अपनी चाय की दुकान से होने वाली कमाई से बहुत खुश है.
आज उसकी चाय की नक़ल बरिस्ता और काफ़ी कैफे वाले करते हैं. आदिवासी महिलाओं का रोज़गार छीनने के लिए बड़ी-बड़ी सब्जियां बेचने वाले रिलायंस फ्रेश और न जाने कितनी चैन खड़ी हो गयी है लेकिन मैं यह बता दूँ कि मुझे सड़क के किनारे खेत से लाई गयी सब्जियां ज़्यादा अच्छी लगती हैं ... मुझे बड़े बड़े स्टाल में जाने से अच्छा लगता है की मैं सड़क के किनारे बैठी महिला से मछलियाँ खरीद कर लूँ. जिसे २० और २० कितना होता है यह पता नही होता है. मैं एक ऐसे अर्थशाश्त्र का हामी हूँ जिसमें गरीब के पास भी ५ रुपया जाए. इसलिए जब मौका लगे दशरथ की चाय ज़रूर पीयें. हो सकता है उसके जैसे हजारों लोगों के बच्चे कम से कम १० वीं क्लास ज़रूर पास कर जायें.

Sunday, December 7

बोयें पेड़ बबूल के आम कहाँ से होए?

इन दिनों हिन्दी के ब्लॉग पर बहुत कुछ पढने को मिल रहा है। खासकर मुंबई में हुए आतंकी हमले की छाया कहीं गद्य और कहीं पद्य के तौर पर निखर कर आ रही है। बहुत ही उम्दा तरीके से आम लोगो के दर्द को बयां किया जा रहा है।
लेकिन मैं इस बात से इत्तफाक नही रख पाता हूँ कि अपने राजनितिक तंत्र को इस हद तक गरियाने से समाज बदल सकता है। रातों रात सब कुछ नही बदल जाता है। रातों रत कुछ नही बदल जाता है।
आपके पास जो राजनितिक नेतृत्व उपलब्ध है उसी के अन्दर से आपको विकल्प तलाशने होंगे। नेताओं का आप निर्यात नही कर सकते। हमारे जन तनतंत्र में यह बहुत ही सुलभ है कि आप जिसे चाहे गाली दे लें। जी भर कर दें लें लेकिन जहाँ पर बात लीड करने की आती है आप और हम पीछे हट जाते हैं बगलें झाँकने लगते हैं। कहने लगते हैं सियासत......न बाबा न. आज कैसे- कैसे लोग नेता बन रहे हैं?? आज कितने एम्.बी.ऐ और टेक्नोक्रेट सियासत में आने को तैयार है.
सर्वे करवा लीजिये किसी भी एजेन्सी से पता चल जाएगा...आम हिन्दुस्तानी की दोहरी सोच का। हमारे लोकतंत्र की यह बहुत बड़ी समस्या है। जिसे पढ़े लिखे लोग सिर्फ़ अध्ययन का विषय मानकर इस पर विचार नही करते. यह आपको और हम सबको पता है.शहाबुद्दीन, राजन तिवारी, आनंद मोहन सिंह, पप्पू यादव, डी पी यादव और दर्जनों ऐसे लोग, जिनकी औकात एक गुंडे से ज़्यादा नही है, हमारी राजनितिक व्यवस्था में अन्दर तक घुसे हुए हैं। संसद में जब मतदान होता हैं नुक्लेअर मुद्दे पर इनका वोट डालना अनिवार्य हो जाता है। क्या कह सकते हैं इसे सिवाय संस्थागत मजबूरी के अलावा।
"दरअसल राजनीति एक बेहद गंभीर पहलु है समाज का और इसे गंदे लोगो के भरोसे नही छोडा जा सकता है...और सुधार की उम्मीद की जा सकती है। " इसका मतलब यह नही है कि मैं भी राजनीति में कूद रहा हूँ...मैं भी वही सोचता हूँ जो करोडों हिन्दुस्तानी सोचते हैं।
मैं भी स्वार्थी हूँ। मैं भी कायर हूँ.मैं भी भीरु हूँ...मै भी बकवास करता हूँ। नेताओं को गाली देता हूँ। जब मौका आता है चुप बैठ जाता हूँ। राजनीति को गंदे लोगों का गन्दा खेल मानता हूँ।
हम हिन्दुस्तानी शोर्ट कट रास्ता इजाद करने में माहिर हैं। मान लेते हैं मुंबई ब्लास्ट के बाद मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के बदलने से जनता का आक्रोश कम होगा लेकिन पुलिस फोर्स को बेहतर हथियार दिलाने के लिए क्या कागज़ दो साल तक नही अटकी रहेगी सचिवालय के गलियारों में...?
मुझे पंजाब के कुछ सेवा निवृत अधिकारी बता रहे थे किस तरह यहाँ अच्छे हथियार लाये गए थे आतंकवाद से निबटने के लिए...पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह होते थे और पुलिस प्रमुख थे के पी एस गिल। घंटे भर में आधुनिक हथियारें मुहैया करा दी गयी। मुख्यमंत्री के लिए जो चोप्पर था उसे पुलिस प्रमुख को दे दिया ताकि पुलिस बेहतर तरीके से लड़ाई लड़ सके। यह उद्धरण मैं इसलिए दे रहा हूँ की हमारे राजनेता समझ सकें की लड़ाई लड़ना कितना आसान हो जाता है अगर पर्याप्त राजनितिक इच्छा शक्ति हो। आज के वक्त में क्या हमारा नेता अपनी सुरक्षा का त्याग कर सकते हैं???ताकि जनता महफूज़ रहे?कतई नही!!कुछ दिनों पहले शरद यादव से यह सवाल पुछा गया की क्या वोह अपनी सुरक्षा कम करेंगे...उन्होंने कहा नही...वोह ऐसा नही कर सकते। ज्यादातर नेता ऐसा ही करेंगे.हमें पता चलता रहता है कि नेता अपनी सुरक्षा बढ़वाने/अपग्रेड करने के लिए क्या-क्या तमाम बहाने करते हैं।लब्बोलुआब यही है कि हमने जैसा बोया है वैसा काट रहे हैं। राजनीति के इस बियावान में अगर बहार लानी है तो अच्छे बीज लगाने कि ज़रूरत है.फ़िर अच्छी फसल तैयार होगी. नही तो झूठे और मक्कार नेता ही पैदा होंगे.जो कहेंगे कुछ औ करेंगे कुछ. नेताओं की अच्छी फसल कैसे तैयार हो...जब बोयें पेड़ बबूल के आम कहाँ से होए?

Friday, December 5

वक्त सोने का नहीं है.....

मुंबई में हुए हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। ऐसा में इसलिए कह रहा हूँ कि जो लोग अमीरी में ज़िन्दगी ऐशो-आराम से गुजार रहे थे उन्हें भी लगने लगा है कि सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ सरकार की ही नही है. पुलिस वालों की ही नही है, सुरक्षा एजेंसियों की ही नही है।सबको कमर कसकर तैयार रहना होगा। तभी आप सही सलामत ऑफिस पहुँच सकेंगे...तभी आपके बच्चे स्कूल जा सकेंगे. तभी आप दो वक्त की रोटी खा सकेंगे. तभी सेंसेक्स चलेगा. विदेशी निवेश आयेगा. हमारा मुल्क तरक्की करेगा.
मुंबई में सी एस टी पर हमने तो देख ही लिया की कैसे पुलिस वालों ने बिना असलहे के आतंकवादियों से दो-दो हाथ किया और उन्हें धरने में भी कामयाब रहे। दूसरी सबसे अहम् बात कि पुलिस वालों के पास सही बुल्लेट प्रूफ़ नही थे...हमने करकरे साहिब को देखा कि वोह जो बुल्लेट प्रूफ़ पहन रहे थे वोह काफी नही था. कुछ वेबसाइट्स पर इस तरह कि खबरें आ रही हैं कि मुंबई के आला अफसरों को दिए गए बुल्लेट प्रूफ़ डिफेक्टिव थे. येही वजह थी कि बहुत से अधिकारी इनका इस्तेमाल नही करते थे...इसके लिए जिम्मेदार कौन है???इसकी जांच हो.
इस्तीफे का नाटक न किया जाए...बड़ा सवाल, कभी भारतीय नौ सेना हिंदुस्तान का गौरव होता था लेकिन नौ सेना पोत "विक्रांत" कि विदाई के बाद दूसरा पोत अभी तक क्यों नही तैनात किया जा सका है. अरब सागर कि इर्द-गिर्द जो रीफ़िनरिएज़ हैं उनकी सुरक्षा के लिए नौ सेना पोत कि निगरानी बेहद ज़रूरी है। कुबेर जहाज़ में जी पी एस सिस्टम लगा था लेकिन फ़िर भी गुजरात पुलिस इससे पकड़ पाने में नाकाम रही. सवाल कई हैं , जिसका कोई जवाब नही मिला है. सर पकड़ कर रोने का मन होता है कि कुबेर काफी समय से बिना लाइसेंस का ही कैसे काम करता रहा. इससे यह बात भी उजागर होती है कि पुलिस के अन्दर भ्रष्ट अधिकारी दो पैसे के लिए देश कि सुरक्षा से समझौता करने में नही पीछे हटते हैं. जिस तरह से एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम काम करता है वैसे हमारे समुद्री इलाकों में क्यों नही है?बड़े स्तर पर सुरक्षा की खामियां दुनिया भर की हैं. लेकिन खामियां गिनाने से ज़्यादा व्यवस्था में बदलाव लाने की ज़्यादा ज़रूरत है. हमारे राजनेता यह देख लें की आप चाहे जिस भी राजनीतिक पार्टी में हैं, जिस भी जाति और धर्म से ताल्लुक रखते हैं. सबसे पहले आप हिन्दुस्तानी हैं. फ़िर कुछ और. है अगर आपके नसों में खून तो वोह हिंदुस्तान के काम आए. एक-एक कतरा बहा दें अपने मुल्क को महफूज़ रखने के लिए.
आपका फ़र्ज़ है कि वैसे नेताओं को, अधिकारियों को बेनकाब करने में हिचके नहीं जो देश के खिलाफ काम करते हैं. हम अपने शहीदों के खून को यूँ ही जाया नहीं होने देंगे. यह मुल्क हम सबका है. चाहे वोह उद्योग पति हों, राजनेता हों, पत्रकार हों, वकील हों, आम आदमी हों. सोने का वक्त नहीं है ये.