Saturday, January 24

सबके लिए क्या अलग-अलग कानून होगा ?

ऐसा कोई कानून नही है, जो कहता हो की आपको ईमानदार होना ही चाहिए, लेकिन अगर आप बेईमानी करते हैं, तो आपको बख्शा नहीं जाएगा...कानून आपसे निबट लेगी। अगर आप भारतीय दंड संहिता की बात करें आम लोगों के लिए यह बात १६ आने सच है।
{Chief Justice of US Supreme Court John Marshall had once said...."Power of Judiciary lies not in deciding cases, nor in Imposing sentences nor in punishing for contempt, but in the trust, faith and confidence of the common man".}
लेकिन जो न्याय पालिका लोगों को सज़ा देती है वही इस बात में यकीं नही रखती। लंबे अरसे से बहस चल रही है कि जजों को भी अपनी संपत्ति का खुलासा करना चाहिए लेकिन न्यायपालिका में ही इस तरह के लोग है जो इस कदम का विरोध करते है। ऐसा क्यों है..?
हाई कोर्ट और निचली अदालतों में कई जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले साबित हो रहे हैं। ऐसे में बेहतर है जब नाव डूब रही है तो या तो उसके छेद को बंद किया जाए। नाव से बार बार पानी निकालते रहने से समस्या सुलझ नहीं जायेगी। आप कब तक ऐसा करेंगे। यकीन मानिये कि हमारे हाई कोर्ट में काम कर रहे कई जज भी इस मुहीम के सख्त खिलाफ हैं कि संपत्ति का हिसाब किताब लिखित में दिया जाए।
कितने जजों के रिश्तेदार वकील हैं..क्या उनके मामले सुनने में निष्पक्षता रह पाती है..इस सवाल पर अभी बड़ी बहस की ज़रूरत है।
राजनितिक दल इस पचडे में नहीं पड़ना चाहते हैं क्योंकि उनका दामन ख़ुद कीचड़ में सना हुआ है। वोह सवाल क्यों उठाएंगे? वो क्यों भ्रष्टाचार को रोकेंगे।
सोमनाथ चटर्जी अकेले ऐसे नेता हैं जो लोक सभा स्पीकर के तौर पर हमेशा ही इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। खासकर जब समाज में शुचिता लाने की बात हो, भ्रष्टाचार दूर करने की बात हो। पिछले कई महीने से सोमनाथ दा कह रहे हैं कि न्यायपालिका के अन्दर भी शुचिता लाने की कवायद शुरू होनी चाहिए। सेशंस कोर्ट और हाई कोर्ट के अन्दर जजों के भ्रष्टाचार में शामिल होने की लगातार खबरें मिलती रही है. लेकिन जब जवाबदेही की बात आती है, तो कोई बोलने को तैयार नही होता. जज के ऊपर कौन अंगुली उठाये यही सबसे बड़ा सवाल है?
न्यायपालिका भी आखिरकार समाज का हिस्सा है। एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जजों की भूमिका काफी बड़ी है। वो ये कहकर कितने दिन बच सकते हैं कि न्यायालय में काम कर रहे जजों से सवाल नहीं पुछा जा सकता है।
जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, जो देश के संवैधानिक मुखिया हैं। कम से कम राष्ट्रपति की नज़र में ये बात तो होनी चाहिए कि कौन सा जज कितने साफ़ सुथरा है। राम जेठमलानी, फली नरीमन जैसे जानकर इस पक्ष में हैं कि जजेज़ भी अपनी संपत्ति का ब्यौरा दें। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन भी इस बात से दुखी हैं कि आखिर जज अपनी संपत्ति का ब्यौरा समय समय पर क्यों नहीं दे रहे हैं।
भले ही कानून बहुत कुछ इस मामले में नहीं कर सकता लेकिन ईमान क्या कहता है। आप ईमान को दांव पर रखकर कब तक न्याय करेंगे। भले ही कुछ सालों के लिए जजों का एक वर्ग इस मांग को रोक पाने में कामयाब हो जाए लेकिन आगे पारदर्शिता की लड़ाई को आप कब तक अनसुना कर सकेंगे।

3 comments:

सुप्रतिम बनर्जी said...

बेहतर और बेबाक!

अनुनाद सिंह said...

न्यायधीश बेइमान रहकर भी इमानदारी का ढ़ो.ग करते हुए डर रहे हैं। क्या जजों का यही हर्म है? धर्म तो कहता है-

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं, श्रुत्वा चैव अनुवर्यताम्।
आतमन: प्रतिकूलानि, परेसां न समाचरेत।

(धर्म का सर्वस्व सुनो और सुनकर इसका अनुपालन करो; जो बात/व्यवहार/नीति अपने प्रतिकूल हो उसे दूसरों पर लागू मत करो।)

सबकी कहानी said...

शुक्रिया..अनुनाद जी अपने बहुत ही सही सूक्ति लिखी है...आप अगर ख़ुद पाक नही हैं तो दूसरों को शुद्धता का पाठ कब तक पढ़ा सकते हैं.