बच्चों की किलकारियों से कभी गूँज रहा था
हस्पताल का वोह कोना
बलविंदर अपने बच्चे को पाकर
कितना खुश हुआ था
ठीक २६ जनवरी का दिन था
जिस दिन हिंदुस्तान के सभी कानून-कायदे
बनाये गए थे .....
तमाम जिम्मेदारियां तय की गयी थी...
लेकिन, हमारी, आपकी एक गलती लील गयी
सब कुछ
बचा कुछ भी नही
सिर्फ़ राख़ भर रह गया
मुट्ठी में
और आंसू जो आँखों से टपके थे
सुख गए ज़मीन पर गिरने से पहले
सिसक दम तोड़ गयी
हलक से निकलने से पहले..
किलकारियां भी
रह गयी हवा में
बिखर गयी
और रह गयी सीने में एक
हूक सी ...
चुभती हुयी
यह किसके बच्चे थे ?
(मेरी ये कविता उन नवजात बच्चों को समर्पित है जो पटियाला के हस्पताल में इन्क्युबेटर में जल कर राख़ हो गए....ज़िन्दगी खिलखिलाने से पहले ही मुरझा गयी। )
Monday, February 2
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3 comments:
उफ़ !!! ह्रदय विदारक !
भाई! सचमुच हृदयविदारक घटना है यह. अस्पतालों से मनुष्यता किस क़दर ग़ायब हो गई है,इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है
ठीक २६ जनवरी का दिन था
जिस दिन हिंदुस्तान के सभी कानून-कायदे
बनाये गए थे .....
...और उसी दिन सारे नियमों को ताक पर रखकर ऐसी दुर्घटना को अंजाम दिया गया !! ऊफ !!!
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