हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है
सबकी सुन ली। अब प्रधान मंत्री के बोलने की बारी है। हम जानते हैं कि मनमोहन सिंह ज़्यादा बोलते नही हैं। बोलते हैं तो सब सुनते हैं। यह वाकया हम देख चुके हैं बीते कुछ सालों में। दरअसल सियासत में बोलना मजबूरी हैं। आप बोलते नही हैं तो लोग कहते हैं कि आप कमज़ोर हैं। आप भीरु हैं। डॉ मनमोहन सिंह ने बता दिया है कि वो न मजबूर हैं न कमज़ोर हैं।
कमज़ोर कौन है? इस मुद्दे पर अब बहस इस दफा शीर्ष से शुरू हुयी है।
उन्होंने प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग अडवाणी को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने कहा कि देश जानता है कि आडवाणी के गृह मंत्री रहते हुए गुजरात में दंगे हुए। मनमोहन ने कहा आडवाणी को जिन्ना विवाद के कारण भाजपा ने अध्यक्ष पद से हटा दिया. वह आडवाणी कमजोर हैं या मैं हूं। शांत से रहने वाले मनमोहन सिंह ने धीमे स्वरों में ही सही, लेकिन अपने जवाब से राजनीति को गरम कर दिया है। यह मनमोहन सिंह का जवाब था। वोह मनमोहन जो सियासत में रहकर भी सियासत से दूर है। या दूर दीखने की कोशिश करता है। उस मनमोहन सिंह के बारे में जिसके बारे में कहाँ जाता रहा कि वो अनमने मन से प्रधान मंत्री बने। कई बार ऐसा मौका आया जब वोह प्रधानमंत्री की गद्दी छोड़ने के मूड में थे। लेकिन निकाल गए पाँच साल। अब दूसरी दफा प्रधान मंत्री बनने कि राह में हैं।
आडवाणी अकेले हैं
आडवाणी सुलझे नेता हैं। ५० साल का इनका राजनीतिक जीवन है। बाबरी मस्जिद विध्वंस को छोड़ दें तो इनके जीवन पर एक धब्बा तक नही है। इमानदारी, अनुशासन और प्रतिबद्धता इनके राजनीतिक जीवन का आधार है। इन्होने जनसंघ से बीजेपी को निकाल कर उसे एक राष्ट्रीय दल का दर्जा दिलाया। रथ पर आरूढ़ होकर जब आडवाणी निकले तो ऐसा लग रहा था कि वोह अटल बिहारी बाजपाई को सियासत में पीछे धकेल देंगे लेकिन आडवाणी को बार-बार अपनी महत्वाकांक्षा से समझौता करना पड़ा।
बार-बार वोह अटल की कुर्सी के पीछे खड़े दीखे। एक लीडर के तौर पर कम एक सहयोगी के तौर पर ज़्यादा। अटल का प्रताप था कि उनके पीछे बहुत से लोग खड़े रहे...और फले-फूले। अटल के रहते नेतृत्व पर विवाद का सवाल ही नही था।
अब बीजेपी में शीर्ष पर आडवाणी अकेले हैं। यह सत्य है कि जब आप शीर्ष पर होते हैं तो अकेले होते हैं। आडवाणी के पीछे कोई अटल नही खड़ा है। एक बहुत बड़ी फौज है दोयम दर्जे के नेताओं की। जो स्वार्थ की भाषा बोलते हैं। अब समय उनके साथ नही है।
कराची जाते हैं तो वहां जिन्ना को भी सेकुलर कह देते हैं। पार्टी में उनकी राय से लोग सहमत नही होते। उनका सेकुलरवाद फ्लॉप हो जाता है। न पार्टी के अन्दर न ही पार्टी के बाहर लोग उनकी सुनते हैं।
क्या करें आडवाणी? उनके पीछे कोई सोनिया नही है।
अडवाणी जब यह कहते हैं कि ७ रस कोर्स से केन्द्र सरकार नही १० जनपथ से चलती है..ग़लत नही है। प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह ने कभी सलूक नही किया। वोह रौब उनके चाल में नही दिखा।
वजह यह रही कि पार्टी का कमांड सोनिया कि हाथ में रहा। सरकार के अहम् फैसलों में कांग्रेस की चली. प्रधानमंत्री के हाथ में पार्टी की डोर नही रही। महत्त्वपूर्ण मौके पर मनमोहन के बजाय सोनिया ज़्यादा मुखर दिखी।
कह सकता हूँ कि आडवाणी और अटल के समय में कमाल की जुगलबंदी देखी...लेकिन मनमोहन सिंह के खेवनहार सोनिया हैं। ये भी कमाल का समीकरण है।
आखिरी मौका है आडवाणी के लिए, तभी तो मनमोहन भी उन्हें घेरने कि तैयारी में दीख रहे हैं। हम उम्मीद करेंगे की भारत की जनता को दोनों ही नेता अपने राजनीतिक विचारों से एक नयी दिशा देंगे।
फ़ैसला तो आखिरकार मतदाता के हाथ में है।
Tuesday, March 24
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