Thursday, April 9
त्रस्त है लोकतंत्र
वोट मांगने के लिए निकल पड़ी है.....
नेताओं की जमात...
सफ़ेद कुरते-पायजामे में लम्बी कारों में
नतमस्तक
हर दरवाज़े पर रुकता है उनका कारवां
पूरब से पश्चिम से
उत्तर से दक्खिन से आकर
हर जगह धुल ही धुल नज़र आता है
और कलरव।
कोलाहल में मुद्दे खो जाते हैं
गरीब, मजलूम लोग
दो रोटी के लिए फाकाकशी करते लोग
दिहाडी करते लोग
कुदाल और फावडे चलाते हुए लोग देखते हैं,
आशा भरी नज़रों से
एकटक
लोग अनायास ही ऊपर उठा लेते हैं अपने-अपने हाथ
होने लगता है जयघोष
विजय मुद्रा में हाथ ताने नेता भी करने लगते हैं
लोकतंत्र का यशोगान
प्रजा भी मंत्रमुग्ध
हर पांच बरस बाद यह कारवां गुजरता रहता है
भारत की गलियों से, पगडंडियों से होकर
गरीबी दूर करने के वादे के साथ
सिर्फ प्रपंच सिर्फ़ प्रपंच
फिर इंडिया शाइन करने लगता है
टीवी के परदे पर, अख़बारों के पन्नो पर
जय हो-जय हो के नारे लगने लगते हैं
लोग भुला दिए जाते हैं
अगले पांच साल के लिए
जय हो लोकतंत्र-लोकतंत्र
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1 comments:
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ... त्रस्त ही है लोकतंत्र।
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