Friday, April 10


जूते की मनोदशा.....

*जूता फेंकने के लिए जूते का मंहगा होना ज़रूरी नही......

*जूते के बदले चप्पल से भी काम चलेगा

*जूता लगे तो भी ठीक, न लगे तो भी ठीक....दोनों ही हालत में काम करता है.

*जूता फेंकने के लिए निशाना ज़रूरी नही..

*ज्यादातर निशाने से बाहर गया है जूता

*जूता देशी हो या विदेशी मैटर नही करता...

*जूता फेंकने वाला ज़रूरी नही की पत्रकार हो.

* जूता फेंकने वाला क्रन्तिकारी नही बन जाता.

*जूता फेंकने वाला अपराधी नही

*जूता फेंकने वाला पागल भी नही ..

*जूते की रफ्तार बताती है कि गुस्सा कितना है..

*जूता फेंकने से जूते की बिक्री नही बढ़ जायेगी...

*नेता अपने सामने अब राहुल द्रविड़ की सेवा लेंगे...

*जो काम कलम नही, अब जूता करेगा

*जूते को यकीन होने लगा है कि उसकी जगह अब पैरों में नही है ..

*जूता बनाने वाली कंपनी को अब देना होगा जूते की मजबूती का टेस्ट

क्या लगता है इतनी मिहनत से बनाया गया जूता नेताओं पर फेंकने के लिए ही बना है...??
जूते की शान में अपने अमूल्य विचार ज़रूर साझा करें...खुशी होगी...

3 comments:

Anonymous said...

एक खबर फ़िल्म इन्ड्र्सटी के एक मश्हूर निर्माता ने एक फ़िल्म बनाने कि घोशणा की है टाइट्ल है "जनरेल का जूता".

श्यामल सुमन said...

जूता की महिमा बढ़ी जूता का गुणगान।
चूक निशाने की भले चर्चित हैं श्रीमान।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Babli said...

मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !