फैज़ अहमद फैज़ की यह शानदार कविता पाकिस्तान में उस समय गायी गयी जब वहां जिया उल हक का आतंक था...इकबाल बालो की आवाज़ में यह कविता ज़रूर सुने..
लाज़िम है की हम भी देखेंगे...
वोह दिन की जिसका वादा था,
जो लोहे अज़ल में लिखा है,
जो जुल्मो सितम के कोहे गरां, रुई की तरह उड़ जायेंगे
हम मह्कुमो के पाँव तले, जब धरती धड धड धड्केगी
और अहले हिकम के सर ऊपर, जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
जब अर्जे खुदा के काबे से, सब बुत उठवाए जायेंगे
हम अहले सफ़ा मर्द्द-ऐ- हरम, मनसद से बिठाये जायेंगे,
सब ताजक उछाले जायेंगे सब तख्त गिराए जायेंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का जो गायब भी है हाजिर है
उट्ठेगा अनलहक का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो और राज करेगी खल्के खुदा
जो में भी हूँ और तुम भी हो...
इस गाने का लिंक:http://www.youtube.com/watch?v=y_EmyqTTHIY
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1 comments:
सही कहा, बिना लाग लपेट के, सबकी कहानी है ये,
निश्चचित ही हर प्रबुद्ध व्यक्ति आज की दशा पर दुखी है.
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