आसमान पर ये बादल घनेरे हैं...
कुछ बूँद भी झर चुके हैं
मैं तेरे आँचल की छाया में बैठा हूँ, आँख मूंदे।
खुशबू जो सालों पहले छोड़ आया था
मेरे अन्दर समा रही है..
मेरा-तेरा रिश्ता भी तो पुराना है
जब उमड़ते-घुमड़ते बादल को देख दौड़ जाता था
नंगे पैर
बेतहाशा
कितने साल हो गए
न वो तेरा साया है
न वो तेरी खुशबू है,
और न वो तेरी आहट है..
आह वो दिन, वो रात वो सुबह, वोह शाम
सब तेरे बिन...
लगता है,
है ही नहीं,
तेरे बिन,
सिर्फ तेरी यादें हैं..



3 comments:
अच्छी बात, कम से कम यादें तो बचीं हैं। मुझे लगता है "वोह" के जगह "वो" होना चाहिए। उम्मीद है बुरा नहीं मानेंगे।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
अच्छी कविता है। शब्दों की वर्तनी को लेकर सजग रहें। भाव सुंदर हैं।
good...mujhe aaj he pata chala ki aap kavitaaye bhi likhte hai...apni bhawnaao ko vyakt karne ka ye tareeka bahut accha hai...
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