Thursday, July 30

सबके लिए धरम-करम का अपना नज़रिया
सबके लिए धर्म की परिभाषा अलग-अलग है। ज़रूरी नही कि आप तीर्थ स्थलों का दर्शन करें, दो डुबकी लगा बस हो गया। आपको परमिट मिल गया, फ़िर आप पाप करते रहें आने आने वाले कई सालों तक। कतई नही।
हम हजारों सालों से यहाँ आते रहे हैं, इसलिए हमारी सदियों की आस्था, जो हमारे अवचेतन में कहीं न कहीं मौजूद हैं, हमें यहाँ खींच लाती है।
हिंदुस्तान भले ही आज अलग-अलग सूबों में बसा है, लेकिन हमारी संस्कृति हमें आपस में जोड़ती है। कुरुक्षेत्र हो या संगम, यहाँ हम अपने विचारों को साझा करते हैं, मूल्यों को आपस में बांटते हैं। दुनिया में ऐसा दूसरा कोई प्रेरक तत्व नही, जो लाखो- करोड़ों लोगों को एक जगह इकठ्ठा कर दें।
महाराष्ट्र, ओड़ीसा, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश; इन तमाम राज्यों के लोगों को को एक साथ भजन करते देखना अपने आप में एक विराट अनुभव है।
राष्ट्रीय एकता की बहुत बड़ी मिसाल हैं, जब कोई बड़ा सूर्य ग्रहण होता है.
इन मौकों का हम कैसे सदुपयोग करें? इस पर विचार नही किया गया।

कई करोड़ लोग पूर्ण सूर्य ग्रहण के मौके पर जमा हुए थे, जहाँ यह संदेश दिया जाना चाहिए था कि कैसे हम अपने विरासत को बचाएं॥
कैसे हम अपने नदियों को बचाएँ। कैसे हम अपने पहाडों को बचाएँ।
हमें पाप से मुक्ति नही मिलेगी अगर हम सिर्फ़ अपने पापों के बारे में सोचेंगे। इस पृथ्वी को बचाना हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी है। हर घंटे हम कितना कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं। लेकिन कभी सोचा है कि इसके बदले पेढ़ भी लगाया जाए।
इन मुद्दों पर सोचना ज़्यादा ज़रूरी है।
आज विकास के इस दौड़ में हमारी ज़रूरतें इतनी बढ़ गयी हैं कि हम अपने आस-पास देखते तक नही। पहाडों और नदियों का इतना दोहन हो रहा है कि हम सही और ग़लत का फ़ैसला करना भूल गए हैं। हमें सिर्फ़ स्वार्थ दीखता है। क्यों न हम ऐसे मौके पर बड़े फैसले करें। ख़ुद के लिए हर कोई करता है। इसमें कोई परमार्थ है ही नही।

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