Sunday, August 16

खान=मुस्लिम=संभावित आतंकी?
ये एक अमेरिकी तरीका है, जिसके हिसाब से हजारों खानों के नाम अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के डाटा बेस में कैद हैं। खान नाम का कोई परिंदा भी अगर अमेरिका की सर ज़मीन से होकर गुजरता है तो उसे रोककर पुछा जाता है कि आप कौन हैं, खान हैं? आप अमेरिका क्यों आ रहे हैं? इतनी बार क्यों आ रहे हैं? जो शायद शाहरुख़ खान से भी पुछा गया। जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि वो फिल्म शूट करने के लिए अमेरिका बार-बार आते हैं. आम आदमी के साथ भी होता होगा ऐसा। लेकिन उनके पास किसी मंत्री का फ़ोन नम्बर नहीं होता होगा। इसलिए ख़बर नहीं बन पाती।
भारतीय मीडिया ने शाहरुख़ खान को अमेरिकी के नेवार्क हवाई अड्डे पर पूछताछ के लिए रोके जाने को खूब उछाला, इस पर खूब बवाल मचाया। मेरे एक मित्र जो एक संजीदा पत्रकार हैं, जयपुर से मुझे फ़ोन किया और पुछा कि आखिर यह कितनी बड़ी बात हो गयी कि सारे न्यूज़ चैनल ने प्राइम टाइम में प्रधान मंत्री के लाल किले पर दिए गए भाषण को तीसरे-चौथे जगह पर टरका दिया और शाहरुख़ बन गए ९ बजे के प्राइम टाइम खबरों के किंग।
शायद शाहरुख़ की फेस वेल्यू ज़्यादा है। लेकिन पूरे देश को ये जानने का हक था कि वो देखें और समझें कि लाल किले की प्राचीर से प्रधान मंत्री ने देश के नाम क्या संदेश दिया आज कल पत्रकार भी सुरक्षा मुद्दों को लेकर बखूबी वाकिफ हैं. फिर राष्ट्र सम्मान की बात कहाँ से आ जाती है?
आतंकवाद है असली मुद्दा...
अब आते हैं असली सवाल पर। क्या आतंकवाद पर समझौता कर लेना ज़रूरी है। शाहरुख़ खान के साथ सुरक्षा जांच को लेकर क्या ज्यादती हुयी ? क्या उनके दिल को इसलिए ठेस लगी कि उन्हें रोका गया और पुछा गया क्या आप "खान" हैं ? ज़ाहिर सी बात है लगी होगी। वो एक देशभक्त हैं और हिंदुस्तान में उनसे शायद ये सवाल कोई नही पूछेगा कि आप खान क्यों हैं ?
लेकिन अमेरिकी धरती पर यह नही देखा जाता कि कौन क्या है। आप ओबामा हों या क्लिंटन आप अपनी औकात में रहें। वहां एक व्यवस्था है, जिससे हर एक को गुजरना होता है।
पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को इस पुलिस अधिकारी से इसलिए झिड़की सुननी पड़ी क्योंकि उन्होंने एक पुलिस ऑफिसर को "stupid" कहा था। पुलिस ऑफिसर ने एक अमेरिकी प्रोफ़ेसर को गिरफ़तार कर लिया ये जानते हुए कि वो ओबामा के करीबी हैं। ओबामा को पूरे देश से माफ़ी मंगनी पड़ी। क्या यहाँ एक पुलिस ऑफिसर की यह औकात होगी कि वो प्रधान मंत्री के करीबी को हाथ भी लगा ले, अगर उसने कोई गुस्ताखी भी की हो फ़िर भी। बहुत बड़ा फर्क है अमेरिका और भारत में।
कुछ दिनों पहले पूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम के साथ तथाकथित तौर पर दिल्ली के हवाई अड्डे पर सुरक्षा के नाम पर ज्यादती हुयी। डॉ कलाम चुप रहे लेकिन देश के स्वाभिमान के नाम पर मीडिया ने खूब हल्ला किया। ये कहाँ तक जायज़ था। भारत भी आतंकवाद के दंश झेल रहा है। ये मुंबई के लोग सबसे अच्छी तरह जानते हैं।
मुझे यह कहने में कोई गुरेज़ नही की हमारी सुरक्षा व्यवस्था बहुत लचर है। नहीं तो हमारी सीमाओं के अन्दर इतने सारे घुसपैठिये मौज नहीं कर रहे होते।
मुझे सलमान खान की बात बहुत अच्छी लगी, जिन्होंने अमेरिका में हुए शाहरुख़ के जांच को ग़लत नहीं माना। आखिर २००१ के बाद अमेरिका में आतंकी हमले क्यों नहीं हुए? वजह है अमेरिका ने ग़लत क्या है सही क्या इस विषय की गहन समीक्षा की है।
हमने आतंकी हमलों से कहाँ सीख ली ? सबसे पहले हमारे नेता ही चिल्लाने लगते हैं कि उनकी जांच नहीं होनी चाहिए। यहाँ आम आदमी मारे जाते हैं हमले में. VIP कमांडो लेकर चलते हैं। उन्हें तो लगता हैं कि गार्ड तो उन्हें बचा ही लेंगे।
नुकसान किसका है? नुकसान हम सबका है। हमें कौन रोकता है कि हम अमेरिकियों कि जांच न करें? फिरंगियों कि जांच न करें, हिन्दुओं की जांच न करें। सिखों की जांच न। मुसलमान हैं इसलिए हाथ न लगायें। हमें यह जान लेना चाहिए कि भारत एक बहुत बड़े खतरे से खेल रहा है. अमेरिका के बाद भारत सबसे बड़ा निशाना है आतंकियों का. वक़्त आ गया है कि हम हिन्दुस्तानी अमेरिका से कुछ सीखें. एक व्यवस्था बनाएं. और हमारे नेता और VIP चिल्ल-पों मचाना बंद करें। खुदा हिंदुस्तान को खैरियत बख्शें.

1 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

सिने स्टार बन्ने से अक्ल नहीं आ जाती, थोडा बहुत दिलीप कुमार से ही सीख लिया होता !