स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद साहिब आज़ाद ख़यालात के व्यक्ति है। पढ़े-लिखे हैं, बातचीत में अंग्रेजी का इस्तेमाल ज़्यादा करते हैं। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि वो जुबान के भी धनी हैं. उनके कई प्रेस कांफ्रेंस देखे हैं, बहुत जल्दी गुस्से में आते हैं. और जब गुस्से में होते हैं, तो उनका दुधिया चेहरा लाल हो जाता है, और हिंदी या उर्दू की जगह वो अंग्रेजी बकने लगते हैं. और फिर जब अंग्रेजी बकने लगते हैं, जुबान फिसल जाती है. गुस्से में अनाप- शनाप बकने लगते हैं जो सोचा भी नहीं होता है।
अब गौर कीजिये उन्होंने स्वास्थ्य मंत्रियों के सम्मलेन में क्या कहा,""Bloody, हम यहाँ पर २०-२४घंटे काम करते है और आप ऐश करते हो." लगता नहीं कि वो किसी को गाली दे रहे थे. दरअसल वो अपनी बात को जोरदार तरीके से रखना चाहते थे. लेकिन शब्द का चयन गलत था. हम हिंदुस्तान में रहते हैं, हिन्दुस्तानी हैं, यहाँ ब्लडी बोलना तमीज़ और तहजीब के खिलाफ़ है. अंग्रेजी स्लैंग में भी सभ्य और कुलीन तबका इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करता. ब्रिटिश अख़बारों में इस शब्द का इस्तेमाल १९३६ तक तकरीबन बंद था। ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डि
क्शनरी ने अपने पहले एडिशन में ब्लडी के बारे में लिखा कि निचले तबके के लोग इसका इस्तेमाल करते ."Its now constantly in the mouths of the lowest classes, but by respectable people considered 'a horrid word', on par with obscene or profane language." (चित्र: साभार डिक्शनरी डॉट कॉम)
(It was used to make a strong statement. Or esp a strong order.
For instance, I don't bloody care!
What the hell bloody are you doing? Don't be such a bloody fool।
If you don't understand it, you are a bloody fool!))
हमें याद है कि बहुत सी हिंदी फिल्मों में अंग्रेजी अफसर हम भारतीयों के लिए ब्लडी शब्द का इस्तेमाल करते रहे हैं. ज़रूरी नहीं कि खुद अपने घरों में वो ऐसा करते होंगे. बहुत से हिन्दुस्तानी जो सोचते अंग्रेजी में हैं और बोलते हिंदी में हैं. उनसे अगर ऐसी गलती हो जाती है ता माफ़ी मांग लेने में कोई हर्ज़ नहीं है. नहीं तो बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगती।
कुछ महीने पहले प्रणब मुख़र्जी और लालू यादव में कहा सुनी हो गयी थे, सब प्रणव दा की अंग्रेजी की वजह से ही हुआ था. बाद में उन्होंने लालू यादव से माफ़ी मांगी और दोनों ने तय किया की एक दुसरे से अंगेजी में बात नहीं होगी. अंग्रेजी ही फसाद की जड़ है. अब कोई गुलाम तो रहा नहीं. और न ही अंग्रेजों का ही राज है। अभी भी पुराने ज़माने के लोग जो अंग्रेजों की संगत में रहे, वो बात-बात में ब्लडी-ब्लडी शब्द का इस्तेमाल करते हैं, गाली के तौर पर. और वैसे लोगों पर जिनको अंग्रेजी का बिलकुल ही ज्ञान नहीं होता. मुझे हंसी आती है.
अब देखिये आज़ाद साहिब ने माफ़ी नहीं मांगी है.क्या ये मान लें कि उनकी समाजी हैसियत कम है। नहीं। लोग दरअसल अपनी नज़र में गिर जाते हैं।
आज़ाद साहिब जुबान बहुत ख़राब चीज़ है, थोडी सी भी फिसल गयी न सारा किया कराया तेल हो जायेगा। या आप कहेंगे, "I bloody don't care!"


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