Sunday, September 13

यादों के ज़ख्म दिखते कहाँ हैं ?
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तुम मुझे याद आती हो
सावन की तरह भादो की तरह
गुजरे हुए मौसम की तरह
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तुम मुझे याद आती हो
दिल की तड़पन की तरह
बचपन की तरह
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कह दो कि नहीं जायेंगे
सावन की तरह
भादो की तरह
दिल में बस जायेंगे
किसी सरगम की तरह
हमदम की तरह
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ये यादें भी कैसी हैं
जो सालों से उलझी है
आती हैं, जाती हैं।
आकर न जाती है
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कैसी ये तड़पन हैं, उलझन है
यादों में, फ़िक्रों में
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आँखों से टपके है शबनम है।
भीगे तो मौसम है,
दो बूँद गिर जाये धरा
पर तो जीवन है।
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यादों के ज़ख्म भरते नहीं,
घासों से उगते हैं
टहनी पर फलते हैं
फूलों से खिलते हैं
सालों से चलते हैं,
बनते बिगड़ते हैं।
यादें तो यादें है,
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((फेसबुक पर मेरे मित्र संदीप बल्हारा और मैंने मज़ाक-मज़ाक में एक तुकबंदी की।))

2 comments:

वाणी गीत said...

यादे तो यादें हैं ..तुकबंदी में भी कम नहीं हैं ..

sunil said...

agar tukbandi aisi hai to kavita kaisi hogi? ati sundar...