Sunday, September 27

फ़िल्मी पर्दे और हकीक़त का पंजाब
पंजाब में किसी भी राजमार्ग की यात्रा कर लें, आपको यकीन हो जायेगा कि जिस सूखे की बात राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में की जा रही है, उसका नामोनिशान नहीं है पंजाब में। पिछले दिनों मैनें चंडीगढ से भठिंडा तक का रास्ता सडक मार्ग से तय किया, ये देखने कि वाकई पंजाब में सुखे का कितना असर पडा है। पटियाला, संगरुर, बरनाला और फरीदकोट के बहुत से हिस्सों में छोटे-बडे और मंझौले किसानों से मिलकर ऐसा नहीं लगा कि पंजाब में किसान सूखे से बेहाल हैं और सूखे की वजह से आत्महत्या कर लेंगे। संगरुर के बहुत से हिस्सों मे किसानों ने बासमती धान भी लगाया है, जिसकी खुश्बू अभी से महसूस की जा सकती है। कई जगह पर धान की कोपलें फुटने लगी हैं। यही हालत कमोबेश पूरे पंजाब की है। देर से हुयी बारिश की वजह से फिलहाल पानी की कमी ख़त्म हो गयी है। अगर ये फसल कामयाब होते हैं तो किसानों की मुसीबत बहुत हद तक खत्म हो जायेगी। छोटे किसान जिन्होने कर्ज़ लेकर खेती की है, उनकी ज़िन्दगी पटरी पर वापिस लौट आयेगी।

हरित क्रांति का दुखद पहलू----

ये फसल अगर लहलहा रहे हैं तो इसका मतलब ये कतई नहीं लगाना चाहिये कि पंजाब में किसान बहुत खूश हैं और यहाँ मानसून की अच्छी बारिश अच्छी हुयी है। दरअसल धान की फसल को किसानों ने अपने खून और पसीने से सींचा है।
पंजाब में राज्य सरकार ८ घंटे की मुफ्त बिजली देती है ताकि किसान अपनी फसल को बचा सके और सूबे की खुशहाली बरकरार रहे। राज्य में कुल बजट प्रावधान का ३० फिसदी हिस्सा सिर्फ बिजली की खरीद और इसके वितरण पर ही खर्च होता है। पंजाब में ६८४१ मेगावाट बिजली पैदा होती है, लेकिन अभी जब धान की फसल खड़ी है, पंजाब को ९००० मेगा वाट बिजली की दरकार है। इसके लिये सरकार को कभी कभी ७-९ रुपये युनिट क़ीमत अदा करके बिजली दूसरे ग्रीडों से खरीदनी होती है। ये सब इसलिये ताकि पूरे देश का अनाज़ भंडार लबालब भरा रहे। किसानों की मिहनत और सरकार की दरियादिली से पंजाब की हरित क्रांति का सफ़र चल रहा है।
धरती सोना उगल रही है। धरती माँ है, इसलिये हर साल कुछ न कुछ उम्मीद से बेहतर देती है। किसानों को निराश नहीं करती। लेकिन माँ की ममता की झोली रीत रही है।
बाहर की दुनिया के लिये पंजाब की कहानी किसी रुपहले फिल्मी पर्दे पर बिल्कुल रंगीली लगती है। लेकिन इस हरित क्रांति के गर्भ में पल रहे विरोधाभास को समझना भी बेहद ज़रुरी है।
पंजाब में मानसून की बरसात इस साल बहुत कम हुयी। पंजाब में किसानों ने धान की खेती करने के लिये मानसून का इन्तज़ार नहीं किया। कमज़ोर मानसून की वजह से हुयी कम बारिश की भरपाई करने के लिये किसानों ने १५ जून के बाद ही धान की रोपाई शुरु कर दी। फसल तो लगा ली गयी लेकिन इसने भुजल स्तर को और नीचे धकेल दिया। भुजल का का इस्तेमाल करके यहाँ ८० फीसदी खेती के लिये किया गया।

अभी चेतो, नहीं तो धरती जायेगी सूखःनासा

नासा ने अपने हालिया अध्ययन में ये पाया है कि पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में ग्राउंड वाटर की स्थिती भयावह हो चुकी है। नासा के ग्रेस मिशन (Gravity Recovery And Climate Experiment) से जुड़े अनुसंधानकर्ता मानते हैं कि दिल्ली सहित पुरे उत्तरी भारत में जल स्तर औसतन हर साल 1.6 इंच गिर रहा है। हैरत की बात ये है कि एक किलो चावल पैदा करने के लिये ३,००-४००० लिटर पानी का इस्तेमाल करना पडता है।
पंजाब की अगर बात करें तो यहाँ हर के १४१ में से १०० प्रखंडों में जल स्तर "अति शोषण ज़ोन" की सीमा को कई साल पहले ही पार कर चुकी है। इन प्रखंडों में भुजल का दोहन ९८ फीसदी हो चुका है, जबकि ख़तरे की सीमा ८० फ़ीसदी जल निकालने के बाद पैदा हो चुकी थी। वैग्याणिक चेतावनी दे चुके हैं कि अगर भुजल का दोहन इसी तरह बरकरार रहा तो २०१५ तक ज़मीनी पानी ख़त्म हो जायेगा। खतरे की घंटी बज चुकी है, लेकिन हम कान बंद करके इसे अनसूना कर रहे हैं।

वोट के मोहजाल में फंसी पार्टियाँ-----

यहाँ सरकार किसानों को नाराज़ नहीं करना चाहती है। खासकर शिरोमणि अकाली दल, जिसका वोट बैंक ग्रामीण पंजाब में है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, जिनका पूरा परिवार किसानी करता है, मुफ्त बिजली का मुद्दा इनके हाथों में किसी झुनझुने की तरह है।
भले ही बहुत से अकाली मंत्री अब कह रहे हैं कि बस करो मुफ़्त बिजली नहीं दी जा सकती है। लेकिन बादल किसानों की राजनीति करते हैं, मुफ्त बिजली नहीं देना उनकी सरकार के हित में नहीं है। युवा वित्त मंत्री मनप्रीत खुद को एक ऐसा बाक्सर बताते हैं जिनको दस्ताने पहनाकर बाक्सिंग रिंग में उतार दिया गया है, लेकिन दोनों हाथ बांध दिये गये है। जहाँ सुधार की बात करने की कोई गुंजाईश नहीं रह जाती है। पंजाब ने ३,१६० करोड़ रुपये किसानों को दी जा रही बिजली की सब्सिडी पर खर्च किये हैं. पंजाब के उपर अलग-अलग एजेंसियों का कर्ज़ बढकर ६३,००० करोड़ रुपये हो गया है। किसानों के ऊपर बैंकों और सुदखोरों की देनदारी ३५,००० करोड़ रुपये है।
हज़ारों किसान पंजाब में खुदकुशी कर चुका है, सरकार मौत की वजह कुछ और बताती है। सुखी होने का भ्रम होना अलग बात है लेकिन इस फेर में सच्चाई से मुँह मोड़ लेना खतरनाक है। हक़ीकत ये है कि पंजाब की खुशहाली के पीछे लाखों अप्रवासी लोगों का हाथ है, जो हर साल अपने रिशतेदार को अकूत दौलत भेजते रहते हैं। राज्य या केन्द्र सरकार को ऐसी योजनाएं बनानी चाहिये जो दीर्घकालिक हो जिससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का हित हो।
(लेख एनडीटीवी इंडिया से साभार इस ब्लॉग पर लगाया जा रहा है)
और अंत में: इस लेख के ज़रिये खेती और किसानो की खुदकुशी जैसे गंभीर मुद्दे को उठाने की मेरी लगातार कोशिश रही है। आप भी अपनी राय से अवगत कराएँ तो अच्छा लगेगा.

1 comments:

समयचक्र - महेंद्र मिश्र said...

हकीकत है .....बढ़िया सटीक प्रस्तुति आभार.