ऐसा कोई कानून नही है, जो कहता हो की आपको ईमानदार होना ही चाहिए, लेकिन अगर आप बेईमानी करते हैं, तो आपको बख्शा नहीं जाएगा...कानून आपसे निबट लेगी। अगर आप भारतीय दंड संहिता की बात करें आम लोगों के लिए यह बात १६ आने सच है।
{Chief Justice of US Supreme Court John Marshall had once said...."Power of Judiciary lies not in deciding cases, nor in Imposing sentences nor in punishing for contempt, but in the trust, faith and confidence of the common man".}
लेकिन जो न्याय पालिका लोगों को सज़ा देती है वही इस बात में यकीं नही रखती। लंबे अरसे से बहस चल रही है कि जजों को भी अपनी संपत्ति का खुलासा करना चाहिए लेकिन न्यायपालिका में ही इस तरह के लोग है जो इस कदम का विरोध करते है। ऐसा क्यों है..?
हाई कोर्ट और निचली अदालतों में कई जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले साबित हो रहे हैं। ऐसे में बेहतर है जब नाव डूब रही है तो या तो उसके छेद को बंद किया जाए। नाव से बार बार पानी निकालते रहने से समस्या सुलझ नहीं जायेगी। आप कब तक ऐसा करेंगे। यकीन मानिये कि हमारे हाई कोर्ट में काम कर रहे कई जज भी इस मुहीम के सख्त खिलाफ हैं कि संपत्ति का हिसाब किताब लिखित में दिया जाए।
कितने जजों के रिश्तेदार वकील हैं..क्या उनके मामले सुनने में निष्पक्षता रह पाती है..इस सवाल पर अभी बड़ी बहस की ज़रूरत है।
राजनितिक दल इस पचडे में नहीं पड़ना चाहते हैं क्योंकि उनका दामन ख़ुद कीचड़ में सना हुआ है। वोह सवाल क्यों उठाएंगे? वो क्यों भ्रष्टाचार को रोकेंगे।
सोमनाथ चटर्जी अकेले ऐसे नेता हैं जो लोक सभा स्पीकर के तौर पर हमेशा ही इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। खासकर जब समाज में शुचिता लाने की बात हो, भ्रष्टाचार दूर करने की बात हो। पिछले कई महीने से सोमनाथ दा कह रहे हैं कि न्यायपालिका के अन्दर भी शुचिता लाने की कवायद शुरू होनी चाहिए। सेशंस कोर्ट और हाई कोर्ट के अन्दर जजों के भ्रष्टाचार में शामिल होने की लगातार खबरें मिलती रही है. लेकिन जब जवाबदेही की बात आती है, तो कोई बोलने को तैयार नही होता. जज के ऊपर कौन अंगुली उठाये यही सबसे बड़ा सवाल है?
न्यायपालिका भी आखिरकार समाज का हिस्सा है। एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जजों की भूमिका काफी बड़ी है। वो ये कहकर कितने दिन बच सकते हैं कि न्यायालय में काम कर रहे जजों से सवाल नहीं पुछा जा सकता है।
जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, जो देश के संवैधानिक मुखिया हैं। कम से कम राष्ट्रपति की नज़र में ये बात तो होनी चाहिए कि कौन सा जज कितने साफ़ सुथरा है। राम जेठमलानी, फली नरीमन जैसे जानकर इस पक्ष में हैं कि जजेज़ भी अपनी संपत्ति का ब्यौरा दें। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन भी इस बात से दुखी हैं कि आखिर जज अपनी संपत्ति का ब्यौरा समय समय पर क्यों नहीं दे रहे हैं।
भले ही कानून बहुत कुछ इस मामले में नहीं कर सकता लेकिन ईमान क्या कहता है। आप ईमान को दांव पर रखकर कब तक न्याय करेंगे। भले ही कुछ सालों के लिए जजों का एक वर्ग इस मांग को रोक पाने में कामयाब हो जाए लेकिन आगे पारदर्शिता की लड़ाई को आप कब तक अनसुना कर सकेंगे।
Saturday, January 24
Wednesday, January 21
ओबामा@चेंज.कॉम
रात भर जग कर बराक ओबामा का शपथ ग्रहण देखता रहा. पूरी दुनिया देख रही थी। मैं कोई अकेला नही था। अश्वेत लोगों की आँखों में खुशी के आंसू थे। अश्वेतों के साथ वहां के श्वेत भी नाच रहे थे. एक दूसरे को चूम रहे थे. रात भर मौज मस्ती चलता रहा. एक अंडरडॉग अफ्रीकन-अमिरिकन बना, दुनिया का सबसे शक्तिशाली आदमी.
ओबामा उस वक्त सत्तानसी हुए जब ख़ुद अमरीका कई देशो में लड़ाई लड़ रहा है। आर्थिक मंदी का सबसे बड़ा खतरा सामने दरपेश हैं। ओबामा ने हमारे भारतीय नेताओं की तरह सब्जबाग नही दिखाए। सीधे मुद्दे की बात की। खतरों की बात की। नागरिको के जिम्मेदारियों की बात की। ये सब सिर्फ़ अमेरिका में ही मुमकिन है। हमें ओबामा अपना लगता है, इसलिए की हमारी त्वचा का रंग उनसे मिलता है। इसलिए हमें खुशी हुयी। और कुछ नही. हम ओबामा के गुणों को आत्मसात कर सकेंगे. ऐसा नही लगता. हमारे नेता यहाँ मर्ज़ का इलाज़ नही बताते, उसे और लंबा खींचने का तरकीब बताते हैं. और वाकई ऐसा करते भी हैं. तभी अमेरिका एक महान देश है. हम पिछले ६० साल में अपने राजनितिक ज़िन्दगी में ज़िम्मेदारी और इमानदारी नही ला सके. देश सेवा का भाव नही जगा सके. बहुत फर्क है अमेरिका में और इंडिया में. पूरे चुनाव अभियान में ओबामा ने यह नही कहा की वोह अश्वेत हैं इसलिए मुझे वोट दीजिये. ये नही कहा कि उनके पुरखों को ट्रेन के फर्स्ट क्लास में बैठने का अधिकार नही था इसलिए वो सत्ता चाहते हैं. "वोह चेंज चाहते हैं. अम्रीका को एक महान राष्ट्र बनाना चाहते हैं. हमारे यहाँ अभी भी अगडों और पिछडों की लड़ाई चलती है. सामाजिक बराबरी को हासिल करने में हम अभी तक नाकाम रहे हैं. अगर कोई दलित मुख्यमंत्री बनता है तो सवर्णों के गाँव में विकास का काम रुक जाता है. ये ही होता है दलितों के साथ भी. कभी मुलायम ओबामा बनते हैं तो कभी दलित की बेटी मायावती. लेकिन ओबामा जैसा व्यक्तित्व और सोच में ठहराव कहीं देखने को नही मिलता.
सभी को साथ लेकर चलने वाला राजनेता अब हिंदुस्तान में नही है.कोई यादवों के नेता है, कोई मराठा है, कोई राजपूतों का नेता है, कोई जाटों का नेता है. कोई बिहारी है, कोई पंजाबी है कोई भइया है, कोई मराठी है, कोई मल्लू है कोई गुज्जू है. सच्चा हिन्दुस्तानी कोई नही है. सच्चा नेता कोई नही है.
मन्दिर के नाम पर लड़ाई, मस्जिद के नाम पर लड़ाई॥ब्लास्ट के नाम पर लड़ाई. आतंकवाद के नाम पर लड़ाई। हिंदुस्तान कहाँ है? किसके दिल में है हिंदुस्तान?
ओबामा उस वक्त सत्तानसी हुए जब ख़ुद अमरीका कई देशो में लड़ाई लड़ रहा है। आर्थिक मंदी का सबसे बड़ा खतरा सामने दरपेश हैं। ओबामा ने हमारे भारतीय नेताओं की तरह सब्जबाग नही दिखाए। सीधे मुद्दे की बात की। खतरों की बात की। नागरिको के जिम्मेदारियों की बात की। ये सब सिर्फ़ अमेरिका में ही मुमकिन है। हमें ओबामा अपना लगता है, इसलिए की हमारी त्वचा का रंग उनसे मिलता है। इसलिए हमें खुशी हुयी। और कुछ नही. हम ओबामा के गुणों को आत्मसात कर सकेंगे. ऐसा नही लगता. हमारे नेता यहाँ मर्ज़ का इलाज़ नही बताते, उसे और लंबा खींचने का तरकीब बताते हैं. और वाकई ऐसा करते भी हैं. तभी अमेरिका एक महान देश है. हम पिछले ६० साल में अपने राजनितिक ज़िन्दगी में ज़िम्मेदारी और इमानदारी नही ला सके. देश सेवा का भाव नही जगा सके. बहुत फर्क है अमेरिका में और इंडिया में. पूरे चुनाव अभियान में ओबामा ने यह नही कहा की वोह अश्वेत हैं इसलिए मुझे वोट दीजिये. ये नही कहा कि उनके पुरखों को ट्रेन के फर्स्ट क्लास में बैठने का अधिकार नही था इसलिए वो सत्ता चाहते हैं. "वोह चेंज चाहते हैं. अम्रीका को एक महान राष्ट्र बनाना चाहते हैं. हमारे यहाँ अभी भी अगडों और पिछडों की लड़ाई चलती है. सामाजिक बराबरी को हासिल करने में हम अभी तक नाकाम रहे हैं. अगर कोई दलित मुख्यमंत्री बनता है तो सवर्णों के गाँव में विकास का काम रुक जाता है. ये ही होता है दलितों के साथ भी. कभी मुलायम ओबामा बनते हैं तो कभी दलित की बेटी मायावती. लेकिन ओबामा जैसा व्यक्तित्व और सोच में ठहराव कहीं देखने को नही मिलता.
सभी को साथ लेकर चलने वाला राजनेता अब हिंदुस्तान में नही है.कोई यादवों के नेता है, कोई मराठा है, कोई राजपूतों का नेता है, कोई जाटों का नेता है. कोई बिहारी है, कोई पंजाबी है कोई भइया है, कोई मराठी है, कोई मल्लू है कोई गुज्जू है. सच्चा हिन्दुस्तानी कोई नही है. सच्चा नेता कोई नही है.
मन्दिर के नाम पर लड़ाई, मस्जिद के नाम पर लड़ाई॥ब्लास्ट के नाम पर लड़ाई. आतंकवाद के नाम पर लड़ाई। हिंदुस्तान कहाँ है? किसके दिल में है हिंदुस्तान?
Tuesday, January 20
ज़रदारी से बड़ा लुच्चा कौन होगा?
ज़रदारी मुंबई हमले के बाद कितनी बार झूठ बोल चुका है, इसकी गिनती वोह खुद भूल चुका होगा। ज़रदारी को याद दिलाना होता है कि दो दिन पहले उसने क्या बोला था। दुनिया को बताने के लिए पाकिस्तान ने कहा कि मौलाना मसूद अजहर पाकिस्तान में नज़रबंद है। दो दिन बाद कहा कि वो पाकिस्तान में है ही नही। पाकिस्तान में भारत का कोई मोस्ट वांटेड अपराधी नही है..पाकिस्तान में कोई आतंकी कैंप नही है... आपको यकीन नही है कि ज़रदारी हमेशा झूठ बोलते हैं झूठ के सिवा कुछ बोलते ही नही. अपनी हालत खस्ता होते देख पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ने यूँ ही अपनी नाकामी का ठीकरा पाकिस्तान के पत्रकारों के सर नही मढ़ दिया। "पाकिस्तान के पत्रकार सबसे बड़े आतंकी हैं।".....
मुंबई हमलों के बाद पाकिस्तान के आधिकारिक बयानों को ज्यादा तवज्जो न दिए जाने से खफा पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अपने देश के मीडियाकर्मियों को आतंकी करार दिया. "पत्रकार गलत रिपोटिंग कर सरकार के सामने समस्या खड़ी कर रहे ."
मुझे एक बहुत बड़ी वजह यह नज़र आती है की पाकिस्तान में कुछ टीवी चैनल्स ने मोहम्मद कसाब (मुंबई में जिंदा पकड़े गया आतंकी) के पिता का इंटरव्यू दिखाया था, जिसमें उसके परिवार वालों ने साफ़ साफ़ कबूल किया था की वोह पाकिस्तान का नागरिक है.ये स्वीकारोक्ति पाकिस्तान के लिए नकारने लायक नही थी, हालाँकि पाकिस्तान की तरफ़ से हमेशा यह कोशिश रही कि किसी भी तरह दुनिया भर कि मीडिया को कसाब के गाँव तक पहुँचने से रोका जाए. कुछ अख़बारों के अलावा अभी तक कोई भी टीवी चैनल वहां नही पहुँच सका है...कसाब के गाँव से पहले नाका लगाया गया है...ज़ाहिर है पाकिस्तान इस सच्चाई को हर कीमत पर दुनिया से छुपाना चाहती है
...और जहाँ तक ज़रदारी की विश्वसनीयता का सवाल है..तो वोह पूरी दुनिया को पता चल चुका है कि ज़रदारी जो आज बोलते हैं...घंटे भर बाद उस बयान से पलट जाते हैं. आज ज़रदारी जैसा झूठा राष्ट्रपति किसी देश का नही है... जरदारी के इस बयान से चकित पाकिस्तान के एक पत्रकार ने कहा कि राष्ट्रपति ने अपने आरोप के समर्थन में एक भी ऐसा उदाहरण पेश नहीं किया, जिससे साबित होता हो कि पाकिस्तानी मीडियाकर्मियों ने गलत रिपोटिंग की है।
मीडिया के लिए बहुत मुश्किल हालात है, जब भी पाकिस्तान में कोई तानाशाह आता है लेकिन लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी गयी ज़रदारी सरकार की मक्कारी से सभी परेशान हो चुके हैं. ज़रदारी एक औरतखोर और घूसखोर नेता रहा है, उससे ईमानदारी की उम्मीद न किया जाए. जो आदमी अपनी बीवी का कभी न हुआ वोह किसी और का कब तक रहेगा। भारत को हमेशा ख्याल रखना होगा कि वोह एक राष्ट्रपति से नही, एक भेडिये से आतंकी को सौंपने कह रहा है। जिसपर पाकिस्तान में ख़ुद लोग बेनजीर की हत्या में शामिल होने का शक करते हैं।
Thursday, January 15
भारत को ऑस्कर नही चाहिए!!!दोस्तों मुझे बहुत खुशी हुयी जब सारे न्यूज़ चैनल पर ये दिखाया जा रहा था कि ऐ. आर. रहमान को "स्लम डॉग मिलियनर "में संगीत देने के लिए गोल्डन ग्लोब अवार्ड से नवाजा गया। मेरा सीना भी फूल गया था। लेकिन अब वापस मेरा सीना पचक गया...उसमें भरी हवा की हवा निकल गयी। वाकई मुझे नही पता था कि इस फ़िल्म में क्या है? इसका कथानक क्या है? पता चला तो फ़िर मुझे घृणा होने लगी कि यह पुरस्कार तो एक तिरस्कार है--भारत का, यहाँ के लोगों का. मजाक है यहाँ की गरीबी का, मुफलिसी का. भारत अब भी विदेशियों के लिए झुग्गियों में रहने वाला शहर है. भारत अब भी सपेरों का शहर है...मदारियों का शहर है.गरीबी बेचों तो अवार्ड मिलता है. गरीबी दिखाओ तो पैसे मिलते हैं. क्या करना है इन पैसों का और किसके लिए सजाना है यह अवार्ड. स्लमडोग में हमारे मुंबई (क्या राज ठाकरे से इजाज़त लेनी होगी हमारे कहने के लिए??) शहर के सबसे बड़े स्लम धारावी को बेचा गया है. गरीबी अभी भी खूब बिकती है पश्चिम में. गोल्डन ग्लोब अवार्ड देने के लिए ज्यूरी बैठी होगी, जहाँ भारत का खूब मजाक उडाया गया होगा. फ़िर सभी सहमत हुए होंगे कि फ़िल्म वाकई शानदार है. यह कुछ नही है. भारत को पीछे धकलने की साजिश है. धारावी की बदसूरती को कैमरा के लॉन्ग शोट, एक्सट्रीम क्लोज़ उप शोट, और हर तरह के सभावित कोणों से फिल्माया गया होगा. मैं हैरान हूँ कि आज भी पश्चिम में लोग भारत के बारे में घटिया सोच रखते हैं. मुझे पूरी उम्मीद थी कि आमिर खान कि फ़िल्म "तारे ज़मीन पर" ऑस्कर की दौड़ में आगे जायेगी. लेकिन हर बार की तरह इसे किसी साजिश की तरह पीछे धकेल दिया गया. हमारे राजकपूर साहेब की बहुत सी फिल्में वहां नही जा सकीं. मदर इंडिया से लोगों को उम्मीद थी, वोह भी ऑस्कर के काबिल थी. दरअसल ऑस्कर जैसे अवार्ड लेने के लिए भारत की गिराया नही जाना चाहिए. इससे बेहतर हो कि भारत के बेहतरीन फिल्मकार और साहित्यकार मिलकर इंडिया का एक अपना ही ऑस्कर शुरू करें. जिसमें विकासशील देश अपने नज़रिए से अपनी चीज़ों कोई देखें. और अगर गरीबी है तो उसका निदान भी सुझाएँ.
(धारावी-चित्र साभार गूगल)((मैं यह बता दूँ कि मैं रहमान साहिब का फैन हूँ. उनकी "वंदे मातरम" एल्बम की याद मेरे दिल में आज भी ताज़ा है, जिसपर हर भारतीयों को गौरव हो सकता है.))
Sunday, January 11
सत्यम का असत्य
अब माथापच्ची करने का समय नहीं, उठकर संभलने का वक्त है। सत्यम ने देश को निराश किया। लोगों की कमाई उडाई. अब कैसे सत्यम को खड़ा किया जाए, सरकार के सामने ये सबसे बड़ी चुनौती है. यह देखकर थोडी राहत मिली है कि केन्द्र ने बिना ज़्यादा वक्त जाया किए किरण कार्निक जैसे आईटी के आइकन को सत्यम को रास्ते पर लाने कि ज़िम्मेदारी दी है. साथ में दीपक पारेख और अच्युतन जैसे जानकर लोग भी हैं. अब ज़्यादा ज़रूरी है कि सत्यम में फ़िर से निवेशकों के विश्वास को बहाल किया जाए. सत्यम ने ही हिंदुस्तान को भारत से बाहर निकालकर इसे सही मायने में इंडिया इंक बनाया. यह नए भारत के उदय की शानदार कहानी थी. लेकिन जिस तरह से सत्यम के रामलिंगा राजू ने निवेशकों के विश्वास के साथ छल किया वो अपने आप में ऐसी घटना थी जिसने भारत के आईटी सुपर पॉवर बनने के सपने को चूर कर दिया है.आईटी इंडिया के लिए ऐसा क्षेत्र रहा है, जहाँ भारत ने अपना झंडा काफी पहले गाड़ दिया था. लाखों लोगों की ज़िन्दगी इसके साथ जुड़ी है, साथ ही साथ भारत का भविष्य भी. लेकिन अभी निवेशकों के यकीन को फ़िर से बहाल करने में ज़रूर वक्त लगेगा. मेरे भी काफी मित्र सत्यम के साथ अमेरिका में नौकरी करते हैं. सत्यम ने उन्हें अच्छी ज़िन्दगी दी. कुछ सालों में ही सत्यम से जुड़े लोग अमीर हो गए. इनके पास घर आ गया. गाड़ी आ गयी. ढेर से पैसे आ गए. लेकिन अब तलवार लटक रही है कि कहीं अमेरिका से वापस उन्हें भारत न वापस बुला लिया जाए. बेरोज़गारी का संकट लोगों के सर पर खौफ बनकर नाच रहा है. भारत और विदेशों में काम कर रहे लोगों कि संख्या भी हजारों में हैं. अब जितना खतरा सत्यम को वापस ट्रैक पर लाने का है उससे कहीं ज़्यादा बड़ा खतरा है इंडिया इंक के सामने. चाइना जैसे देश ऐसे मौके की तलाश में हैं कि कैसे भारत के हाथों से आईटी लीडर का खिताब चीन जाए. यह संकट भारत की अर्थव्यवस्र्था को और ज़्यादा खंगाल सकती है।
Friday, January 9
तेल के खेल में सरकार चित्त !!!
कहाँ है सरकार? क्या कर रही है? क्या हो रहा है पूरे मुल्क में? सरकार है भी या सो रही है। मालूम नही। मुझे तो लगता है कि यह किसी लड़ाई से कम नही है..!!!सडकों पर अफरा-तफरी फैली है। हर कोई कहता है टैंक फुल कर दो। टैंक फुल कर दो। कौन है इस अफरा तफरी के लिए जिम्मेदार। चंडीगढ़ से चेन्नई...कोल्कता से लेकर मुंबई, अहमदाबाद सब जगह बूरा हाल है। देश के ३२००० पेट्रोल पम्प में से ८० फीसदी खाली हो चुके हैं। हवाई सेवा पर असर हो चुका है। बच्चे स्कूल नही जा सके कई शहरों में। यह सिर्फ़ तीन दिन के अन्दर हुआ है। पेट्रोल कंपनी और सरकार के बीच काफी दिनों से यह पलक झपकने का खेल चल रहा था। सरकार कोई ऐसी पहल नही कर रही है कि जिससे हड़ताल ख़त्म हो।आर्मी का काम नही है की वोह तेल बेचे। ऐसे में पिस रहे हैं आम लोग, जिनका इस पूरी लड़ाई में कोई कसूर नही है. सरकार ने कुछ दिनों पहले पेट्रोल डीजल और गैस की कीमत कम करने के संकेत दिए लेकिन जनता को राहत मिल पाती उसके पहले ही सरकार के मनसूबे पर पेट्रोलियम कंपनियों ने पानी फेर दिया. अब हम भुगत रहे हैं केन्द्र सरकार के नाकारापन के नतीजे को. जल्द ही चुनाव होने वाले हैं जनता इसे याद रखेगी. बेवकूफी की भी हद है।
पेट्रोल कंपनियां भी सराहने लायक नही हैं जिन्होंने पूरे मुल्क को बंधक बना लिया है। इसमें ज्यादातर अफसरों की सैलरी लाखों में है। लेकिन लोभ का कोई अंत नही है।
क्या मुरली देवडा जवाब देंगे?डॉ मनमोहन सिंह जवाब देंगे?
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