Monday, February 23
हमार लइकी चिन्हात नाही.....
पिंकी ऑस्कर की चकमक देखकर खिलखिला रही थी। कल तक उसकी तरफ़ कोई देख नही रह रहा था. होठ कटी बच्ची से भला कौन प्यार करेगा?
कौन है जो उससे लाढ देगा? लेकिन ये भी होना था। आज सारी दुनिया खुश है उसके होठों पर मासूम सा मुस्कान देखकर। गाँववाले तालियाँ बजा रहे थे।
हकीक़त येही है की हमारे समाज में ऐसी बहुत सी पिंकी है, जिसको घरवाले एक अच्छा नाम तक नही देने की कोशिश करते। पिंकी ने इस सोच को बदल दिया है। अगर पूरी तरह से नही तो कम से कम इसकी शुरुआत तो ज़रूर की है. पिंकी जैसी लड़कियों को को पढ़ने की ज़रूरत है। ज़रूरत है की घरवाले उसे भी रोटी-दूध खिलाये, दूध-भात खिलाये। वोह सबका नाम रोशन करेगी। अब तो यकीन हो गया न की पिंकी भी ऑस्कर जीत सकती है। स्माईल पिंकी एक डॉक्युमेंटरी फ़िल्म बनकर रह गयी। एक पूरी फ़िल्म इस पर नही बनाई जा सकती थी। इसमें वो मसाला नही था, जो स्लमडॉग मिलिनर में था.मैंने एक मॉल में जाकर स्लमडॉग मिलिनर देखा. मुझे दिल से कहूं, पिक्चर देखकर बहुत बहुत खुशी नही हुयी थी. मुझे रहमान का स्कोर बहुत अच्छा लगा था. गुलज़ार साहेब का गीत हो तो उसे अच्छा होना ही था. मुझे खुशी रहमान और गुलजार के लिए है. दोनों को सलाम. मुझे आज भी शक है कि डॉन ब्योल कि जगह पर कोई हिन्दुस्तानी निर्देशक होता तो शायद उसका नोमिनेशन भी नही होता. मैं अपने इस बात पर पहले भी कायम था आज भी कायम हूँ.
Friday, February 13
कहाँ भूला....कुछ तो नही..
हमारे सपने तलाश लाते हैं
वही पुराने दोस्त
वही पुराने घर..
वही बाग़ बगीचे
वही पुराने इमली के पेढ़
वही पुराने हमसफ़र
वही...
मास्टर साब के हाथों पिटने की सज़ा
वही बसों के पीछे झूलकर स्कूल जाना,
रस्ते में लोगों को मुंह चिढाना
वही साइकिल से गिर कर घुटने का छिल जाना
दूसरे के खेतों से गन्ना चुराना
सब जैसे कल की बात हो
माँ के हाथों बेलने से पिटना
पापा के डर से छत पर छुप जाना
भइया का किताब गुस्से में फाड़ देना...
फ़िर वही फटी किताबें पढ़ना
पुरानी बातें याद करके ऑंखें नम हो जाना
फ़िर यह देखना कि किसी ने देखा तो नही...
हमें लगता है कि हम बाहर से बड़े हो गए हैं
लेकिन हमारे अन्दर का इंसान
वही हसरतें लिए जीता रहता है
छुटपन में जाने को बेकरार
सब कुछ जैसे कल की बात हो...
कुछ नही भूला...
कुछ भी नही भूला
आज भी जिंदा है
हमारे अन्दर वोह बचपन...
जीने दो मुझे..फ़िर से
यह क्या ज़िन्दगी है मेरे दोस्त...
Wednesday, February 11

कई दिनों के बाद आज धूप खिली है...
बारिशों में जैसे मन का मैल धुल सा गया है
धूप गुनगुनी हो गयी है...
कई दिनों के बाद हवा में गर्मी बढ़ गयी है...
और जैसे आसमान का किनारा भी नज़र आने लगा है...
कितना क़रीब...
कई दिनों के बाद मौसम कितना खुल गया है...
फ़िर भी कितना बेचैन है
ये मन...
आखिर ये मौसम बदलता क्यों है...
और हम भी क्यों बदलते है...
मौसम की तरह...
Wednesday, February 4
कभी तितली कभी मच्छर बम....
कभी सुना था मच्छर बम क्या होता है ?
चौंकिए नही मैंने भी नही सुना था। लेकिन टीवी पर जब से तालिबान का जंग चल रहा है। नए-नए जुमले गढे जा रहे हैं। जंग को और अधिक रोमांचक बनने के तरीके निकाले जा रहे हैं। अभी रात के १० बजे तकरीबन ५ हिन्दी न्यूज़ चैनलों पर युद्ध के काले-काले बादल छाए हुए हैं। अफगानिस्तान से लेकर स्वात घाटी तक तोप गूँज रहे हैं। मिसाइल से निकली आग में बड़े-बड़े पर्वत जलकर स्वाहा हो रहे हैं..शहर के शहर धू-धू कर जल रहे हैं। सब कुछ तालिबान कर रहा है, करा रहा है।
अमेरिका में और ब्रिटेन में चल रहे एक भी चैनल में इन लड़ाईयों की कोई ख़बर नही है। बीबीसी और सी. एन. एन चुप बैठे हैं। लेकिन यहाँ युद्ध चालू है। हिन्दोस्तान के किसी भी भाषाई चैनलों पर लड़ाई की कोई झलक नही है...पंजाबी, मराठी, तमिल, भोजपुरी कहीं भी लड़ाई नही देख रहा हूँ।
सुबह से लेकर शाम तक लड़ाई। शायद चैनल चलाने वालों को ज़्यादा पता होगा कि क्या दिखाना चाहिए और क्या नही दिखाना चाहिए..लेकिन इतना तय है कि बाज़ार में बने रहने के लिए कुछ भी किया जाएगा। जो युद्ध की बात नही करेगा...वोह आज के समय में नही देखा जाएगा। कम से कम अभी का ट्रेंड तो यही कह रहा है। यू ट्यूब हाज़िर है।
स्क्रिप्ट लिखने के लिए दो चार कलम बाज़, लिख्हाड़ लोग बिठा लिए जायें तो प्राइम टाइम का काम तो निकल ही सकता है। समय के साथ अंदाज़ बादल जायेंगे...कल तक ओसामा था, फ़िर ओबामा ...और अब वापिस फ़िर तालिबान...आगे पता नही क्या होगा।
वोह दिन दूर नही जब पत्रकारों अपनी नौकरी छोड़ कर भाग जाएगा ...इसलिए कि उसे पर्वत , कंदराओं में , गुफाओं में शिवलिंग खोजने के लिए भेज दिया जाएगा। बल्कि भेजा जा रहा है। हिमालय के ग्लेशियर में उसे शंकर भगवन को खोजने कहा जाने लगेगा। हो सकता है हनुमान की जगह उसे संजीवनी बूटी लाने के लिए कहा जाए।
मेरा मतलब है पत्रकारिता को कितना गिराया जाएगा। पत्रकारों के लिए रह क्या जाएगा । जितने तितली बम और मच्छर बम बनेंगे....नुकसान ज़्यादा होगा भाई पत्रकारों का ही। पत्रकारिता का भला न तो बम बरसाने से होगा से होगा और न ही तितलियाँ उडाने से।
Monday, February 2
सिर्फ़ राख़ भर रह गया
हस्पताल का वोह कोना
बलविंदर अपने बच्चे को पाकर
कितना खुश हुआ था
ठीक २६ जनवरी का दिन था
जिस दिन हिंदुस्तान के सभी कानून-कायदे
बनाये गए थे .....
तमाम जिम्मेदारियां तय की गयी थी...
लेकिन, हमारी, आपकी एक गलती लील गयी
सब कुछ
बचा कुछ भी नही
सिर्फ़ राख़ भर रह गया
मुट्ठी में
और आंसू जो आँखों से टपके थे
सुख गए ज़मीन पर गिरने से पहले
सिसक दम तोड़ गयी
हलक से निकलने से पहले..
किलकारियां भी
रह गयी हवा में
बिखर गयी
और रह गयी सीने में एक
हूक सी ...
चुभती हुयी
यह किसके बच्चे थे ?
(मेरी ये कविता उन नवजात बच्चों को समर्पित है जो पटियाला के हस्पताल में इन्क्युबेटर में जल कर राख़ हो गए....ज़िन्दगी खिलखिलाने से पहले ही मुरझा गयी। )
Sunday, February 1
गाज़ा और दुनिया के तमाम भूखे बच्चे...
नीचे एक पत्र है, जो गाजा में रह रहे एक बच्चे ने इस्राइल के अपने दोस्त के नाम भेजा है। पत्र मर्मस्पर्शी है। गाजा में युद्ध की विभीषिका इस कदर है कि इसमें बच्चे सबसे ज़्यादा शिकार हो रहे हैं। ऐसा तो हर युद्ध में होता है जहाँ कहीं भी हिंसा होती है। बच्चे अनाथ होते हैं, बेघरबार होते हैं। वियतनाम, कम्बोडिया, मोगादिशु , अफगानिस्तान, इराक, पूर्व सोविएत के कई हिस्सों में जहाँ गृह युद्ध चालू है....एक तरफ़ युद्ध है। विकसित देश अपने हथियारों का सौदा कर रहे हैं वहीँ कई मुल्कों में लोग खाने को मोहताज़ हैं। फ़ूड एंड एग्रीकल्चर आरगेनाइजेशन के आंकडे बता रहे हैं हैं कि आने वाले २०५० तक अगर अनाज का उत्पादन दुगुना नही किया गया तो १० करोड़ लोगों को खाने के लिए अन्न नही मिलेगा। किसानो को अपने अनाज के पैसे नही मिल रहे हैं जिससे किसान वैसे अनाज पैदा करने को मजबूर हैं जिससे ज़्यादा पैसा मिले। यह सिर्फ़ भारत, ब्राजील और चाइना जैसे मुल्क ही नही कर रहे बल्कि विकसित राष्ट्र भी इसी रस्ते पर चल रहे हैं। आतंकवाद फैलाने वाले देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तो हालत बदतर होंगे। जहाँ रोज़ मर्रा कि चीज़ें पहले से ही इतनी महँगो हो चुकी हैं।
FROM GAZA WRITES A CHILD TO HIS ISRAELI FRIEND
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I write with a painful heart,Oh my dear friend!,
I have been wrecked before we could meet;
Your forces brought an unprecedented havoc,
Now I am unable even to walk on my feet.
Since the time, we became friends on the net,
'To work for mutual love', were our dreams;
Your bombs have deprived me of everything,
Our hopes are shattered by wails and screams.
Today I came from the hospital without my legs,
To see the debris of my house and parents dead;
Staying under the sky, with none of mine left,
What to say? how to pick up the life's thread.?
But in your countless mails about my welfare,
I still find some traces of humanity in your land;
They give me delight,when you prayed for me,
" May God save you from Israel's brutal hand";
Your solemn words revived my zest and zeal,
With faith in the Divne, and strength of arm;
I shall make ceaseless efforts till my last breath,
For my country to regain its glory and charm.

