Saturday, August 22

लब क्यों "आज़ाद" हैं तेरे ? OR BLOODY I DON'T CARE!
स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद साहिब आज़ाद ख़यालात के व्यक्ति है। पढ़े-लिखे हैं, बातचीत में अंग्रेजी का इस्तेमाल ज़्यादा करते हैं। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि वो जुबान के भी धनी हैं. उनके कई प्रेस कांफ्रेंस देखे हैं, बहुत जल्दी गुस्से में आते हैं. और जब गुस्से में होते हैं, तो उनका दुधिया चेहरा लाल हो जाता है, और हिंदी या उर्दू की जगह वो अंग्रेजी बकने लगते हैं. और फिर जब अंग्रेजी बकने लगते हैं, जुबान फिसल जाती है. गुस्से में अनाप- शनाप बकने लगते हैं जो सोचा भी नहीं होता है।
अब गौर कीजिये उन्होंने स्वास्थ्य मंत्रियों के सम्मलेन में क्या कहा,""Bloody, हम यहाँ पर २०-२४घंटे काम करते है और आप ऐश करते हो." लगता नहीं कि वो किसी को गाली दे रहे थे. दरअसल वो अपनी बात को जोरदार तरीके से रखना चाहते थे. लेकिन शब्द का चयन गलत था. हम हिंदुस्तान में रहते हैं, हिन्दुस्तानी हैं, यहाँ ब्लडी बोलना तमीज़ और तहजीब के खिलाफ़ है. अंग्रेजी स्लैंग में भी सभ्य और कुलीन तबका इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करता. ब्रिटिश अख़बारों में इस शब्द का इस्तेमाल १९३६ तक तकरीबन बंद था। ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी ने अपने पहले एडिशन में ब्लडी के बारे में लिखा कि निचले तबके के लोग इसका इस्तेमाल करते .
"Its now constantly in the mouths of the lowest classes, but by respectable people considered 'a horrid word', on par with obscene or profane language." (चित्र: साभार डिक्शनरी डॉट कॉम)
(It was used to make a strong statement. Or esp a strong order.
For instance, I don't bloody care!
What the hell bloody are you doing? Don't be such a bloody fool।
If you don't understand it, you are a bloody fool!))
हमें याद है कि बहुत सी हिंदी फिल्मों में अंग्रेजी अफसर हम भारतीयों के लिए ब्लडी शब्द का इस्तेमाल करते रहे हैं. ज़रूरी नहीं कि खुद अपने घरों में वो ऐसा करते होंगे. बहुत से हिन्दुस्तानी जो सोचते अंग्रेजी में हैं और बोलते हिंदी में हैं. उनसे अगर ऐसी गलती हो जाती है ता माफ़ी मांग लेने में कोई हर्ज़ नहीं है. नहीं तो बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगती।
कुछ महीने पहले प्रणब मुख़र्जी और लालू यादव में कहा सुनी हो गयी थे, सब प्रणव दा की अंग्रेजी की वजह से ही हुआ था. बाद में उन्होंने लालू यादव से माफ़ी मांगी और दोनों ने तय किया की एक दुसरे से अंगेजी में बात नहीं होगी. अंग्रेजी ही फसाद की जड़ है. अब कोई गुलाम तो रहा नहीं. और न ही अंग्रेजों का ही राज है। अभी भी पुराने ज़माने के लोग जो अंग्रेजों की संगत में रहे, वो बात-बात में ब्लडी-ब्लडी शब्द का इस्तेमाल करते हैं, गाली के तौर पर. और वैसे लोगों पर जिनको अंग्रेजी का बिलकुल ही ज्ञान नहीं होता. मुझे हंसी आती है.
अब देखिये आज़ाद साहिब ने माफ़ी नहीं मांगी है.क्या ये मान लें कि उनकी समाजी हैसियत कम है। नहीं। लोग दरअसल अपनी नज़र में गिर जाते हैं।
आज़ाद साहिब जुबान बहुत ख़राब चीज़ है, थोडी सी भी फिसल गयी न सारा किया कराया तेल हो जायेगा। या आप कहेंगे, "I bloody don't care!"

Monday, August 17

कब तक खाप का कलंक ढोएगा हरियाणा ?

खाप नहीं बनायेगा कल का भारत !
खाप जब कोई तुगलकी फैसला लेता है, तो हमारी प्रतिक्रिया यही होती है कि सरकार क्यों नहीं कुछ करती है? न्यायपालिका क्यों नहीं कुछ करती है? हमें लगता है कि समाज ६ ठी सदी में वापस जा रहा है। सभ्य समाज की कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया होगी। लेकिन आज़ादी एक इतने सालों बाद भी हम इस सोच को क्यों नहीं बदल सके। क्यों समाज में महिलाऐं इस स्थिति में आ सकी कि वो अपना अधिकार मांग सके. हमारे गृह मंत्री पी चिदंबरम सही कहते हैं कि प्रेमी जोडों कि हत्या भारत के सर पर कलंक है. लेकिन हरियाणा में कौन इस खाप के गले में घंटी बांधे. कांग्रेस अपने शुभ हाथों से ये काम नहीं करेगी. कांग्रेस का सत्ता में वापस आने का पूरा इमकान है. और खाप को नाराज़ करें कौन. सवाल हरियाणा के नेताओं से है कि इन खाप को नाराज़ करने पर वोट बैंक पर कितना सर पड़ेगा?? इन तमाम सवालो के जवाब तलाशती ये रपट. पूरा पढने के लिए जाइये एनडीटीवी इंडिया पर।
सौजन्य: एनडीटीवी इंडिया से
http://khabar.ndtv.com/2009/08/17171346/ColumnBraj170809.html

Sunday, August 16

खान=मुस्लिम=संभावित आतंकी?
ये एक अमेरिकी तरीका है, जिसके हिसाब से हजारों खानों के नाम अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के डाटा बेस में कैद हैं। खान नाम का कोई परिंदा भी अगर अमेरिका की सर ज़मीन से होकर गुजरता है तो उसे रोककर पुछा जाता है कि आप कौन हैं, खान हैं? आप अमेरिका क्यों आ रहे हैं? इतनी बार क्यों आ रहे हैं? जो शायद शाहरुख़ खान से भी पुछा गया। जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि वो फिल्म शूट करने के लिए अमेरिका बार-बार आते हैं. आम आदमी के साथ भी होता होगा ऐसा। लेकिन उनके पास किसी मंत्री का फ़ोन नम्बर नहीं होता होगा। इसलिए ख़बर नहीं बन पाती।
भारतीय मीडिया ने शाहरुख़ खान को अमेरिकी के नेवार्क हवाई अड्डे पर पूछताछ के लिए रोके जाने को खूब उछाला, इस पर खूब बवाल मचाया। मेरे एक मित्र जो एक संजीदा पत्रकार हैं, जयपुर से मुझे फ़ोन किया और पुछा कि आखिर यह कितनी बड़ी बात हो गयी कि सारे न्यूज़ चैनल ने प्राइम टाइम में प्रधान मंत्री के लाल किले पर दिए गए भाषण को तीसरे-चौथे जगह पर टरका दिया और शाहरुख़ बन गए ९ बजे के प्राइम टाइम खबरों के किंग।
शायद शाहरुख़ की फेस वेल्यू ज़्यादा है। लेकिन पूरे देश को ये जानने का हक था कि वो देखें और समझें कि लाल किले की प्राचीर से प्रधान मंत्री ने देश के नाम क्या संदेश दिया आज कल पत्रकार भी सुरक्षा मुद्दों को लेकर बखूबी वाकिफ हैं. फिर राष्ट्र सम्मान की बात कहाँ से आ जाती है?
आतंकवाद है असली मुद्दा...
अब आते हैं असली सवाल पर। क्या आतंकवाद पर समझौता कर लेना ज़रूरी है। शाहरुख़ खान के साथ सुरक्षा जांच को लेकर क्या ज्यादती हुयी ? क्या उनके दिल को इसलिए ठेस लगी कि उन्हें रोका गया और पुछा गया क्या आप "खान" हैं ? ज़ाहिर सी बात है लगी होगी। वो एक देशभक्त हैं और हिंदुस्तान में उनसे शायद ये सवाल कोई नही पूछेगा कि आप खान क्यों हैं ?
लेकिन अमेरिकी धरती पर यह नही देखा जाता कि कौन क्या है। आप ओबामा हों या क्लिंटन आप अपनी औकात में रहें। वहां एक व्यवस्था है, जिससे हर एक को गुजरना होता है।
पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को इस पुलिस अधिकारी से इसलिए झिड़की सुननी पड़ी क्योंकि उन्होंने एक पुलिस ऑफिसर को "stupid" कहा था। पुलिस ऑफिसर ने एक अमेरिकी प्रोफ़ेसर को गिरफ़तार कर लिया ये जानते हुए कि वो ओबामा के करीबी हैं। ओबामा को पूरे देश से माफ़ी मंगनी पड़ी। क्या यहाँ एक पुलिस ऑफिसर की यह औकात होगी कि वो प्रधान मंत्री के करीबी को हाथ भी लगा ले, अगर उसने कोई गुस्ताखी भी की हो फ़िर भी। बहुत बड़ा फर्क है अमेरिका और भारत में।
कुछ दिनों पहले पूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम के साथ तथाकथित तौर पर दिल्ली के हवाई अड्डे पर सुरक्षा के नाम पर ज्यादती हुयी। डॉ कलाम चुप रहे लेकिन देश के स्वाभिमान के नाम पर मीडिया ने खूब हल्ला किया। ये कहाँ तक जायज़ था। भारत भी आतंकवाद के दंश झेल रहा है। ये मुंबई के लोग सबसे अच्छी तरह जानते हैं।
मुझे यह कहने में कोई गुरेज़ नही की हमारी सुरक्षा व्यवस्था बहुत लचर है। नहीं तो हमारी सीमाओं के अन्दर इतने सारे घुसपैठिये मौज नहीं कर रहे होते।
मुझे सलमान खान की बात बहुत अच्छी लगी, जिन्होंने अमेरिका में हुए शाहरुख़ के जांच को ग़लत नहीं माना। आखिर २००१ के बाद अमेरिका में आतंकी हमले क्यों नहीं हुए? वजह है अमेरिका ने ग़लत क्या है सही क्या इस विषय की गहन समीक्षा की है।
हमने आतंकी हमलों से कहाँ सीख ली ? सबसे पहले हमारे नेता ही चिल्लाने लगते हैं कि उनकी जांच नहीं होनी चाहिए। यहाँ आम आदमी मारे जाते हैं हमले में. VIP कमांडो लेकर चलते हैं। उन्हें तो लगता हैं कि गार्ड तो उन्हें बचा ही लेंगे।
नुकसान किसका है? नुकसान हम सबका है। हमें कौन रोकता है कि हम अमेरिकियों कि जांच न करें? फिरंगियों कि जांच न करें, हिन्दुओं की जांच न करें। सिखों की जांच न। मुसलमान हैं इसलिए हाथ न लगायें। हमें यह जान लेना चाहिए कि भारत एक बहुत बड़े खतरे से खेल रहा है. अमेरिका के बाद भारत सबसे बड़ा निशाना है आतंकियों का. वक़्त आ गया है कि हम हिन्दुस्तानी अमेरिका से कुछ सीखें. एक व्यवस्था बनाएं. और हमारे नेता और VIP चिल्ल-पों मचाना बंद करें। खुदा हिंदुस्तान को खैरियत बख्शें.

Sunday, August 2

शहीद उधम सिंह आज भी ज़िंदा हैं।
इनकी शहादत के 69 साल पूरे हो गए। इनके जज़्बे को पूरे देश का सलाम। १९१९ में जलियाँवाला बाग़ में हुए कत्लेआम का बदला लेने के लिए उधम सिंह अमेरिका, जर्मनी और बाकी देशों में भेष बदलकर रहे।
आखिरकार ३१ जुलाई, १९४० को जनरल डायर को मार गिराया।
यह अपना नाम मोहम्मद सिंह आजाद लिखते थे, इंग्लैंड में इनकी अन्तिम क्रिया की गयी लेकिन उनकी एक मज़ार भी पंजाब के फ़तेहगढ़ साहिब में बनाई गयी। हिंदू, मुस्लिमों और सिखों में उधम सिंह बहुत लोकप्रिय हैं।
(नीचे इनके बुत के साथ गुरबक्स सिंह हैं जो पिछले ४० सालों से शहीद उधम सिंह की एक बड़ी प्रतिमा लगवाना चाहते हैं। साथ ही अपनी ज़मीन बेचकर एक वृद्ध आश्रम बनवाना चाहते हैं..)