महंगाई : पिज्जा में मंजूर, प्याज में नहीं !
लेखक: संयम श्रीवास्तव
हम भारतीय जीने के लिए नहीं, खाने के लिए जीना सीख रहे हैं। खाद्य पदार्थों की महंगाई ने सरकार को मुश्किल में डाल में दिया है। आखिर प्याज की कीमतों ने ही दिल्ली में एक बार बीजेपी सरकार का डिब्बा गोल कर दिया था। खुशी की बात यह है कि जब प्याज की कीमत बढ़ती है, तो आम जनता, मीडिया और राजनीतिक दलों को समझ में आता है कि महंगाई बढ़ रही है। अन्यथा बच्चों की पढ़ाई का खर्चा, मकान किराया या कीमत, दवा-दारू का खर्च चाहे कई सौ प्रतिशत बढ़ जाए, देश के चारों स्तंभों पर जूं तक नहीं रेंगती।
बढ़ती महंगाई दर के बावजूद पिछली बार कांग्रेस ने विजय हासिल कर ली थी, क्योंकि प्याज ने महंगाई के सूचकांक पर अपनी पताका नहीं फहराई थी। अब विचार करने वाली बात यह है कि आखिर प्याज और टमाटर की कीमत से ही लोगों की नींद क्यों टूटती है। आप कहेंगे कि सवाल पेट का है। देश की करोड़ों गरीब जनता के पेट की जब बात हो, तो हल्ला होना स्वाभाविक है, पर यहां बात कुछ और ही है। मेरे एक मित्र ने अपनी एक पोस्ट में लिखा कि पब्लिक को टाटा की सस्ती और कम खर्चीली नैनो पसंद नहीं आ रही है। टाटा को उसे बेचने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। आम गरीब जनता को दिल्ली सरकार द्वारा बेची जा रही सस्ती और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद पीली दाल खरीदने में भी रुचि कभी नहीं जगी। उसे तो बस अरहर की ही दाल चाहिए। दरअसल हमारा और आपका जीवन स्तर अब बहुत ऊपर उठ गया है। अब हम भारतीय जीने के लिए नहीं खाते, बल्कि खाने के लिए जीना सीख रहे हैं। मैं इस समय चंडीगढ़ में हूं। इससे पूर्व नोएडा, बनारस, गोरखपुर, लखनऊ और इलाहाबाद जैसे भिन्न-भिन्न सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि वाले शहरों में मैंने अपने जीवने का समय गुजारा है। लेकिन इन शहरों में मैंने पिछले दस सालों में अपनी पढ़ाई और काम के दौरान अखबारों में एक खबर समान रूप से पढ़ी। वह यह है कि इन सभी शहरों में शराब की खपत हर साल दोहरे अंक में बढ़ रही है। उससे भी बड़ी बात यह है कि दारू की घटिया ब्रांड की खपत की बढ़ोतरी दर महंगे ब्रांड की तुलना में गिरती जा रही है। इसी तरह दोपहिया बाजार की बढ़ोतरी भी चार पहिया के सामने ठंडी पड़ रही है। रेलवे रिजर्वशेन के लिए पहले स्लीपर क्लास के टिकट मुश्किल से मिलते थे और एसी क्लास के टिकट आसानी से मिल जाते हैं। आज हालात ऐसे हैं कि एसी क्लास के टिकट पहले नो रूम बताते हैं। सब्जियों के मुकाबले चिकन और मटन की मांग तेजी से बढ़ रही है। हम पिज्जा खरीदने में जितना टैक्स चुका देते हैं, उतने में बढ़ी हुई दर में भी दो टाइम के लिए प्याज खरीद सकते हैं। कहने का मतलब है कि हमें पिज्जा की महंगाई मंजूर है, पर प्याज की नहीं। हम ब्रांडेड चीजों के लिए चाहे खाद्य पदार्थ ही क्यों न हो, के लिए अपनी जेबें ढीली करने में नहीं रोते, लेकिन जब गेहूं, दाल प्याज या टमाटर की कीमत बढ़ती है, तो हमें मिर्ची लगने लगती है। हम अपने घर का बजट कम करने के लिए कभी मल्टीप्लेक्स, रेस्टोरेंट, ब्यूटीपार्लर और पिज्जा के खर्च को कम नहीं करते। महंगाई की गाज हम गिराते हैं दूधवाले और अखबारवाले पर। खर्चा बढ़ते ही पहले दूध की मात्रा कम करेंगे, फिर अखबारों की संख्या घटा देंगे। दरअसल मानव मनोविज्ञान है कि गरीब की पत्नी सबकी भौजाई हो जाती है। हमारी सरकार बिल्डर्स, कॉर्पोरेट्स, पेट्रोल पर टैक्स तो कम नहीं कर पाती और गरीबों के पेट के नाम पर सारा जोर खाद्य पदार्थों की दरों को कम बनाए रखने में लगा देती है। शायद इसी कारण देश के महंगाई सूचकांक को भी खाद्य पदार्थों की दर से जोड़ कर रखा गया है। क्योंकि खाद्य पदार्थों की दर को दोहरे अंक से कम रखकर सस्ती लोकप्रियता हासिल करते रहा जाए। शायद यही वजह है कि सारी सरकारें कृषि के पूर्ण बाजारीकरण का रास्ता रोके खड़ी हैं। आखिर किसान को क्यों न हक हो कि वह बढ़ती डिमांड की गंगा में अपना हाथ धो सके। जब हम स्वतंत्रता के छह दशकों में किसानों के आदर्श सहकारिता मॉडल का विकास नहीं कर सके, तो एक बार पूरी तरह कृषि को बाजार के भरोसे छोड़कर देखने में हर्ज क्या है? हम देख चुके हैं पहले भी किसानों का कितना भला हुआ है...?
(लेखक दैनिक भास्कर में समाचार संपादक हैं।)
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