ब्रज मोहन सिंह
जनता की नज़रों में सरकार की गिरती साख
पिछले १० सालों का सबसे बेहतरीन आईडिया यह है कि किसी भी समस्या को हमेशा के लिए ख़त्म करना है तो कोई कमिटी बना दी जाये या किसी कमीशन का गठन कर दिया जाये। केंद्र की सरकार ने इस अदा में महारत हासिल कर ली है।
लोकपाल बिल को लेकर केंद्र ने एक ज़बरदस्त कमिटी बनाई हैं लेकिन इससे कुछ सामने भी निकल कर आयेगा, इस बात का यकीन किसी को नहीं है। खुद अन्ना हजारे कई बार सरकार और उसमें शामिल मंत्रियों की मंशा पर सवाल उठा चुके हैं। सरकार की साख लोगों की नज़र में गिर चुकी है, इसको फिर से वापस पाना सबसे बड़ी चुनौती है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए और कांग्रेस की नेत्री सोनिया गांधी के लिए।
अगर केंद्र सरकार को चलाने वाले यह समझते हैं कि डंडे के ज़ोर पर देश चल सकता है तो वह बहुत बड़े मुगालते में हैं। सरकार चलती है लोगों के विश्वास से।
लोकतंत्र में चुनाव क्यों होता है ? इसलिए कि जनता अपने मताधिकार की शक्ति सरकार को सौंप देती है। दोनों के बीच अलिखित करार होता है कि सरकार ही अब उसके हितों का ख्याल रखेगी। भारत में या किसी और देश में नेताओं को यह सहज गुमान हो जाता है कि वह अब उनके प्रतिनिधि नहीं रहे, राजा बन गए हैं। यही लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट है। केंद्र की यु पी ऐ सरकार भी शायद इसी भ्रम में जी रही है
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